अन्तःखेती तकनीक खेती में नवाचारों से आय हुई दुगुनी

Updated on December 1, 2020

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से विशेषकर किसान वर्ग ज्यादा प्रभावित है। उनकी खेती की लागत बढ़ रही है, उत्पादन घट रहा है और नुकसान का प्रतिशत दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है, जिससे छोटे-मझोले किसानों के समक्ष खाद्य सुरक्षा एक चुनौती के रूप में उभर रही है। इस चुनौती से निपटने हेतु पश्चिमी चम्पारण में नौतन प्रखण्ड के बाढ़ प्रभावित गांव बैकुण्ठवा के किसानों ने गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन गु्रप एवं विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के कोर सपोर्ट सीड डिवीजन के तकनीकी सहयोग से खेती में विविध प्रकार के नवाचारों को अपनाकर न सिर्फ अपनी आजीविका सुरक्षित की है, वरन् खेती में स्थाईत्व लाते हुए खाद्य सुरक्षा भी मजबूत की है। यह अन्य क्षेत्रों के किसानों के लिए उदाहरणस्वरूप है।


26 दिनों पूर्व पंजाब व हरियाणा के किसानों द्वारा शुरू किये गये किसान आन्दोलन का विस्तार धीरे-धीरे देश के अन्य राज्यों में भी होता जा रहा है। कड़ाके की ठण्ड में खुले आसमान के नीचे आन्दोलन करने को मजबूर इन किसानों के लिए किसानों के तथाकथित हित में बने वर्तमान कृषि कानून मुख्य मुद्दा हैं। हालांकि सरकार और किसान दोनों के अपने-अपने पक्ष हैं और तर्कों के आधार पर दोनों पक्ष सही हैं, परन्तु थोड़ा इतर होकर सोचने की जरूरत है कि क्यों छोटे-बड़े सभी किसान इस आन्दोलन से जुड़ रहे हैं। हमेशा बिचौलियों की वजह से नुकसान में रहने वाला किसान आज भी क्यों उसी स्थिति में है? उसे उसके उत्पादों का उचित मूल्य क्यों नहीं मिल पा रहा है? सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात की है, परन्तु किसानों की लागत को देखते हुए क्या वे समर्थन मूल्य वाजिब हैं? इसके साथ ही सिर्फ बड़ी फसलों जैसे- धान, गेंहूं, गन्ना जैसी फसलों पर ही न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रावधान है, ऐसी स्थिति में छोटे व सब्जी की खेती करने वाले किसानों के लिए क्या व्यवस्था है? आदि ऐसे बहुत से प्रश्न हैं, जो अनुत्तरित हैं और इन्हीं प्रश्नों का जवाब पाने के लिए आज किसान सड़कों पर उतर पड़ा है। इन सबके साथ किसान जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को भी झेल रहा है। जलवायु परिवर्तन आज विश्वव्यापी समस्या है, जिसका सीधा असर खेती किसानी पर पड़ता है। कभी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कही जाने वाली कृषि की कमर आज स्वयं ही टूट रही है। न सिर्फ लगातार महंगे होते निवेश अर्थात् बीज, खाद, जुताई, सिंचाई से किसान जूझ रहा है, वरन् सरकारी नीतियां भी छोटे किसानों के लिए सहायक नहीं हो पा रही हैं। उपर से मौसम का न समझ आने वाला मिजाज किसानों की मुश्किलों को और बढ़ा रहा है।

बेमौसम बरसात, गर्मी, कम बारिश आदि के कारण खेती लगातार घाटे का सौदा होती जा रही है। उस पर परम्परागत रूप से की जा रही एकल खेती से एक तरफ तो खेती में नुकसान अधिक हो रहा है तो दूसरी तरफ लागत भी बढ़ रही है। इसके साथ ही बाढ़, जल-जमाव, सूखा जैसी आपदाओं का प्रकोप भी बढ़ता जा रहा है। इन आपदाओं के क्षेत्र का विस्तार भी हो रहा है और बाढ़, सूखा के नये-नये क्षेत्र तैयार हो रहे हैं।

जल जैसी प्राकृतिक सम्पदा से प्रचुर बिहार राज्य में छोटे एवं सीमान्त किसानों की बहुलता है। नदी-नाले की अधिकता यहां की पहचान और बाढ़ यहां की प्रमुख आपदा है। यहां के किसान ज्यादातर धान एवं गन्ना की एकल खेती करते हैं। इधर कुछ दशकों में जलवायु की बदलती प्रवृत्ति ने किसानों का जोखिम बढ़ाया है। कम समय में अधिक बारिश होने, बारिश कम होने तथा एक बारिश से दूसरी बारिश के बीच लम्बा अन्तराल होने के कारण किसान बाढ़ एवं सूखा दोनों परिस्थितियों को झेल रहे हैं। नतीजतन खेती पर व्यापक दुष्प्रभाव पड़ रहा है। धान की खेती बाढ़ में या तो डूब जा रही है या फिर सिंचाई पर अधिक लागत व्यय करनी पड़ रही है।

पहल
इन स्थितियों को ध्यान में रखते हुए गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन ग्रुप ने वर्ष 2018 में खेती व आजीविका में तकनीक एवं नवाचारों का समावेशन करने की दृष्टि से बिहार राज्य के पश्चिमी चम्पारण के नौतन प्रखण्ड के पांच गांवों – बैकुण्ठवा, झखरा, जगदीशपुर, जमुनिया एवं पकड़िया में डी0एस0टी0 कोर सपोर्ट के सीड डिवीजन के वित्तीय सहयोग से कार्य करना प्रारम्भ किया।

प्रारम्भ में संस्था कार्यकर्त्ताओं ने इन गांवों में खुली बैठक कर छोटे, मझोले व महिला किसानों की समस्याओं को समझा, जिसमें निकल कर आया कि यहां के लोगों की मुख्य समस्या एकल खेती, खेती में लागत का अधिक लगना, उपज कम होना एवं मौसम सम्बन्धी सूचनाओं का न मिल पाना था। एक त्वरित आधारभूत सर्वेक्षण के बाद यह महसूस किया गया कि उपरोक्त समस्याओं पर गहनता से कार्य करने की आवश्यकता थी। कार्य का आरम्भ करते हुए प्रत्येक गांव में दो ऐसे किसानों का मॉडल किसानों के रूप में चयन किया गया, जो खेती में नवाचारों को करने में रूचि रखते थे एवं खेती में जोखिम लेने का साहस रखते थे। इन मॉडल किसानों के साथ सघन रूप से कार्य करते हुए खेती के नवीन तकनीकों एवं विधाओं पर इनकी समझ विकसित की गयी।

इसी के साथ गांव में अन्य किसानों तक पहुंच बनाने की दृष्टि से महिलाओं का स्वयं सहायता समूह गठित किया गया। गांव में छोटे-छोटे कृषि उपकरणों तक लघु, सीमान्त एवं महिला किसानों की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक दो गांव के क्लस्टर पर एक कृषि सेवा केन्द्र की स्थापना भी की गयी। इन कृषि सेवा केन्द्रों के सुचारू संचालन के लिए एक समिति का गठन भी किया गया, जिनकी प्रत्येक माह एक निर्धारित तिथि पर बैठक कर किसानों की आवश्यकता आकलन, समस्याआंे का आकलन एवं समाधान की दिशा में सुझाव आदि विषयों पर चर्चा की जाने लगी। प्रत्येक माह प्रत्येक गांव में किसान विद्यालयों का संचालन कर वहां से भी समस्याओं को जाना गया और उसी के अनुरूप तकनीकों के विकास की दिशा में कार्य करना प्रारम्भ किया गया।

तकनीकों का विकास: एक अहम गतिविधि
एक अहम गतिविधि के तहत् किसानों के लिए तकनीकों के विकास पर कार्य किया गया। किसानों की समस्याओं के समाधान के रूप में मुख्य रूप से स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हुए कम लागत की तकनीकों को सामने लाने का कार्य किया गया। इनमें से कुछ समस्याओं के समाधान हेतु हार्ड तकनीक एवं कुछ समस्याओं के लिए साफ्ट तकनीक पर काम किया गया। उदाहरणस्वरूप चर्चा में निकलकर आया कि खेती की लगभग सभी गतिविधियों में महिलाओं की प्रमुख भूमिका होती है। विशेषकर रोपाई एवं निराई-गुड़ाई में इनको अधिक श्रम एवं समय का निवेश करना पड़ता है। निराई-गुड़ाई का कार्य अधिक समय तक बैठकर अथवा झुककर करने से इन्हें कमर, पैर, पीठ एवं हाथों में दर्द की समस्या उत्पन्न हो जाती है। साथ ही समय भी अधिक लगता है। बिहार के पश्चिमी चम्पारण क्षेत्र में जहां काम किये गये क्षेत्र के आधार पर मजदूरी मिलती है, वहां पर अधिक समय वाला काम करने में महिलाओं की आमदनी कम होती है। ऐसी स्थिति में साइकिल निराई-गुड़ाई यंत्र का विकास किया गया। इसके आगे एक साइकिल का पहिया लगा होने तथा हैण्डिल होने से महिलाएं आसानी से इस यंत्र के उपयोग से निराई-गुड़ाई का काम कर लेती हैं। इसके साथ ही इससे लाइन से बुवाई की खेती भी आसानी से होने के कारण पुरूष एवं महिला दोनों किसानों की पहली पसन्द बन गया है।

कुछ ऐसी तकनीकों का भी विकास किया गया, जो खेती सम्बन्धी गतिविधियों में आती हैं। इसके तहत्् विशिष्ट फसल संयोजन के साथ बहुस्तरीय खेती, पालीथीन मल्चिंग, आदि तकनीकों को शामिल किया गया। इनके उपर एक पूरे फसल चक्र में निर्धारित किसान के साथ परीक्षण किया गया एवं उसके परिणामों के आधार पर फसल संयोजन को तैयार किया गया। इसके अन्तर्गत आलू के साथ करैला, लौकी के साथ बैगन, लौकी के साथ सेम, कुंदरू के साथ बोड़ा, मक्का के साथ मूंग, मक्का के साथ गोभी व मूली, गन्ना के साथ आलू, गन्ना के साथ प्याज, गन्ना के साथ बैगन आदि का संयोजन तैयार किया गया।

प्रक्षेत्र से प्रयोगशाला तक: राघवशरण की कहानी
सामान्यतः छोटे, मझोले किसानों की पहुंच बड़े किसानों, तकनीकी संस्थानों, कृषि विज्ञान केन्द्रांे, विषय विशेषज्ञों तक प्रत्यक्ष तौर पर नहीं हो पाती, जिससे बहुधा तकनीकों के विकास में उनकी आवश्यकता को ध्यान में नहीं रखा जाता। इसी कमजोर कड़ी को ध्यान में रखकर डी0एस0टी0 कोर सपोर्ट परियोजना अन्तर्गत किसानों को सीधे विज्ञान से जोड़ने की बात की जा रही है। जहां किसान अपनी समस्याओं को पहचान कर उनके समाधान हेतु स्थानीय स्तर पर तकनीकों के विकास एवं परीक्षण की दिशा में कार्य कर रहा है और प्रक्षेत्र स्तर पर तकनीकों की व्यवहार्यता एवं उपयोगिता सिद्ध हो जाने के बाद उसे प्रयोगशाला से जोड़ने की कवायद की जा रही है।

बिहार राज्य के पश्चिमी चम्पारण जिले के नौतन प्रखण्ड में स्थित ग्राम बैकुण्ठवा के 55 वर्षीय राघवशरण ऐसे ही किसान हैं, जिन्होंने तकनीकों को अपने खेत पर परीक्षण कर उसे विभिन्न प्रयोगशालाओं से जोड़ने का काम किया। इनका चयन परियोजना के अन्तर्गत मॉडल किसान के रूप में किया गया। लगभग 2 एकड़ खेत के स्वामी राघवशरण धान एवं गन्ना की खेती मुख्य रूप से करते हैं। परियोजना से जुड़ाव के पश्चात् इन्होंने खेत एवं पशु से प्राप्त अपशिष्टों से जैविक खाद व कीटनाशक बनाने की तकनीक सीखी, खाद बनाया एवं अपने खेतों में प्रयोग किया। ये संस्था की तरफ से दिये जाने वाले मौसम सम्बन्धी जानकारियों को प्राप्त करते हैं एवं खेती सम्बन्धी गतिविधियों में उसका उपयोग करते हैं। राघवशरण कहते हैं, ‘‘संस्था से जुड़ाव के बाद हमको अन्य संस्थानों जैसे कृषि विज्ञान केन्द्र के बारे में जानकारी मिली, कृषि विभाग एवं कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों से बात करने की हिम्मत मिली तब हमारा जुड़ाव बढ़ा। पहले तो हम केवल धान और गेंहूं की खेती करते थे, परन्तु जबसे संस्था के साथ जुड़ाव बढ़ा, हमने मिश्रित खेती, एक साथ कई तरह की खेती करने के बारे में सीखा और उसे कर रहे हैं।’’ जलवायु परिवर्तन से अनुकूलन स्थापित करने के लिए इन्होंने अपनी खेती की पद्धति में बदलाव किया और एकल फसलों के स्थान पर खेती में विविधीकरण अपनाया।

गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन ग्रुप के साथ सक्रिय जुड़ाव रखने वाले किसान राघवशरण कृषि विज्ञान केन्द्र, माधोपुर से भी नियमित सम्पर्क में रहते हैं और सरकारी योजनाओं से जुड़ाव करते रहते हैं। संस्था द्वारा आयोजित किसान विद्यालयों में नियमित प्रतिभाग करने के क्रम में इन्हें गन्ना की ट््रेंच विधि से खेती करने के विषय में जानकारी मिली। इन्होंने इसमें नवाचार किया और गन्ना की मिश्रित खेती की। गन्ना की पारम्परिक विधि से बुवाई में एक लाइन से दूसरी लाइन के बीच 3 फीट की दूरी होती है, लेकिन इन्होंने गन्ना की दो लाइनांे के बीच 5.5-6 फीट की दूरी रखी और बीच के स्थान का उपयोग करते हुए उसमें बैगन और अगैती मूली की खेती की, जिससे इनको तिहरी आय हुई। इनका कहना है ‘‘यद्यपि इस विधि में एकल खेती की अपेक्षा तीनों फसलों की उपज कम हुई, परन्तु हमारा बाजार से जुड़ाव निरन्तर बना रहा। हमने अपने आधा एकड़ खेत से 25,000 रू0 से उपर की मूली बेची। मूली खत्म होते-होते तक बैगन बाजार में आने लगा, जिससे आमदनी निरन्तर होती रही।’’ इस विधि से खेती करने पर लागत भी कम लगती है। राघवशरण का कहना है कि तीनों फसलों की बुवाई के लिए एक ही बार खेत की तैयारी करनी पड़ती हैं। एक साथ सिंचाई करने में तीनों फसलों के लिए नमी हो जाती है और उर्वरक भी तीनों के लिए एक ही बार लगता है।

मौसम सम्बन्धी जानकारी एवं उससे होने वाले फायदों के उपर चर्चा करते हुए राघवशरण कहते हैं ‘‘गन्ना की बुवाई के एक माह खेत में सिंचाई करना पड़ता है। हमने अगस्त में गन्ना लगाया। सितम्बर में 19-20 में बारिश होने का पूर्वानुमान संस्था से आ गया, हमने सिंचाई नहीं की। नियत समय पर बारिश हुई और हमारी सिंचाई की लागत बच गयी, जिसे हमने खाद में उपयोग किया।’’

इनके द्वारा की गयी गन्ना के साथ बैगन व मूली की अन्तःखेती तथा गन्ना की एकल खेती में लगने वाली लागत एवं आमदनी को तालिका सं0 1 के माध्यम से देख सकते हैं-

तालिका 1: एकल व अन्तःफसली में लागत एवं आमदनी

गन्ना की एकल खेती गन्ना के साथ बैगन व मूली की अन्तःखेती
 

क्षेत्रफल (एकड़ में)

कुल लागत (रू में) कुलउपज (कु0 में) कुल आय (रू0 में) क्षेत्रफल (एकड़ में) कुल लागत (रू में) कुल उपज (कु0 में) कुल आय (रू में)
 

0.50

 

11392.00 135

 

49275.00 0.50 12492.00 गन्ना  120 43800.00

26700.00
22500.00

मूली     20
बैगन  15
कुल आय कुल आय                       93000.00

 

0.50 एकड़ में एकल व अन्तःफसली का तुलनात्मक विश्लेषण तालिका सं0 2 में प्रदर्शित है-
तालिका 2: एकल व अन्तःफसली का तुलनात्मक विश्लेषण

विवरण गन्ना गन्ना +बैगन +मूली
उपज ;कु0 मेंद्ध 135 155
खेती की लागत ;रू0 मेंद्ध 11392.00 12492.00
कुल आय ;रू0 मेंद्ध 49275.00 93000.00
शुद्ध आय ;रू0 मेंद्ध 37883.00 80508.00
उत्पादन की लागत ;उ0/कु0द्ध 84.38 80.59
लागत-लाभ अनुपात 1:4.32 1:7.44

 

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि यद्यपि अन्तःफसली खेती में एकल खेती की अपेक्षा मुख्य फसल की उपज अपेक्षाकृत कम होती है, फिर भी अन्य फसलों के साथ संयुक्त रूप से देखने पर कुल उपज बढ़ जाती है, लागत ;जुताई, सिंचाई, उर्वरक, मानव श्रम आदिद्ध कम लगती है और उसी के सापेक्ष आय में भी लगभग दुगुने का लाभ होता है।

परिणाम
इन गतिविधियों से न केवल किसानों की खेती एवं उससे सम्बन्धित आजीविका में स्थाईत्व आया है, वरन् जलवायु परिवर्तन से निपटने की उनकी क्षमता में भी वृद्धि हुई है। आज इन पांचों गांवों के 50 से अधिक किसान इन विशिष्ट फसल संयोजनों को अपनाकर खेती में मौसम के कारण होने वाले नुकसान को कम करने में सक्षम हो रहे हैं। पहले एकल खेती करने के कारण बारिश या विपरीत मौसमी परिस्थितियों के चलते फसल बरबाद हो जाती थी, परन्तु अब अन्तःफसली खेती करने के कारण उनके नुकसान में कमी आने लगी है। दूसरी तरफ इनका वर्ष भर बाजार से भी जुड़ाव बना रहता है। साथ ही एक ही खेत में विविध प्रकार की फसलों को लगाने से इनकी लागत में भी कमी आती है। खेत की तैयारी, सिंचाई, निराई-गुड़ाई, खाद, कीटनाशक आदि का एक ही खर्च लगता है। परिवारों की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा में भी गुणवत्तापूर्ण वृद्धि हुई है। किसान के पूरे परिवार के लिए वर्ष भर पोषणयुक्त खाद्य की उपलब्धता भी सुनिश्चित हो पा रही है।

नवाचारों/तकनीकों का विस्तार
खेती में किये जा रहे इन नवाचारों/तकनीकों को स्थानीय स्तर पर लोगों द्वारा सराहा जा रहा है। किसान इस तरीके की खेती करने के प्रति उत्सुक हो रहे हैं। राघवशरण द्वारा ट््रेंच विधि से अधिक दूरी वाली गन्ने की खेती के साथ बैगन व मूली की सहफसली खेती से होने वाली आय को देखते हुए आस-पास के 8-10 किसान इसी तरीके की गन्ने के साथ बैगन व मूली की खेती कर रहे हैं। कुछ किसान थोड़ा और अधिक नवाचार करते हुए अक्टूबर के गन्ने के साथ आलू और जुलाई के गन्ने के साथ बैगन की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं। राघवशरण का खेत एक प्रयोगशाला के तौर पर काम कर रहा है, जहां पर वे नित नये प्रयोग करते रहते हैं। विभिन्न बीज कम्पनियांे द्वारा अपने बीजों का परीक्षण एवं परिणाम जांचा जाता है। इनके इस प्रक्षेत्र को देखने हेतु दूर-दूर से उत्साही किसान एवं अन्य लोग आते हैं। यद्यपि स्थानीय स्तर पर इन तकनीकों को काफी मान्यता व स्वीकार्यता है, फिर भी बड़े पैमाने पर इसका विस्तार करने हेतु और अधिक कार्य करने की आवश्यकता है।


Author: Archana Srivastav, Ajay Kumar

Gorakhpur

 

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