हसीरूहब्बा जैसे पौधरोपण उत्सवों का आयोजन करने के माध्यम से सामुदायिक सहयोग के साथ पौधरोपण की संस्कृति को ग्रामीण जीवन शैली में समाहित किया जाता है।
हर साल पूरे विष्व में विभिन्न मुद्दों के लिए मनाये जाने वाले 123 विषिष्ट दिनों में पृथ्वी पर मृदा और पौधों के जीवन की रक्षा करने के लिए तीन दिन सुरक्षित हैं – विष्व वन्य दिवस (21 मार्च), विष्व पृथ्वी दिवस (22 अप्रैल) एवं विष्व पर्यावरण दिवस (5 जून)। इन अवसरों को एक उत्सव के रूप में मनाने के अलावा पौधों और मानव जीवन के लिए उनके लाभों के ऊपर आम जनमानस के बीच कोई चर्चा नहीं की जाती है।
पेड़ लगाना सभी नागरिकों का कर्त्तव्य है, क्योंकि सभी को स्वस्थ रहने के लिए स्वच्छ हवा एवं पर्यावरण की आवष्यकता है। हालांकि लोग विष्व पर्यावरण दिवस जैसे अवसरों पर सिर्फ पौध लगाने तक ही अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। यह पौधे ही हैं जो पूरी पृथ्वी पर रहने वाले जीवों को भोजन उपलब्ध कराते हैं, यह पौधे ही हैं जो हानिकारक गैसों को अपने अन्दर समाहित करते हैं और हवा को स्वच्छ बनाते हैं। एक देष में कम से कम 33 प्रतिषत भूमि पर वनाच्छादन होना चाहिए। लेकिन, हालिया शोधों के अनुसार, भारत में वनाच्छादित क्षेत्र 20 प्रतिषत से भी कम है। इसलिए पेड़ लगाना एवं उनकी सुरक्षा करना अधिक महत्वपूर्ण है।
हसीरू हब्बा, हरित उत्सव
वाटरषेड विकास, कृषि-वानिकी, कृषि- औद्यानिक आदि तमाम वृक्ष आधारित विकास कार्यक्रमों पर तीन दषकों तक काम करने के बाद बाएफ इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि पौधों/वृक्षों के रोपण को खेतिहर समुदायों एवं आम जन के जीवन का एक हिस्सा बनाना होगा। सामुदायिक सहभागिता के साथ पौधरोपण को उनके जीवन शैली में समाहित करना ही एक रास्ता है और इसे गांवों एवं शहरों में अन्य उत्सवों की तरह एक उत्सव के तौर पर मनाया जाना चाहिए।
ग्रामीण समुदायों को शामिल करते हुए वृक्षारोपण को बड़े पैमाने पर लोकप्रिय बनाने के क्रम में, कर्नाटक स्थित स्थाई आजीविका और विकास के लिए कार्य कर रहे संगठन बाएफ ने वर्ष 2001 से अपने सभी परियोजना आच्छादित क्षेत्रों में हसीरू हब्बा- हरित उत्सव को लोकप्रिय बनाता रहा है। पौधरोपण को धार्मिक स्वरूप प्रदान करने का एक प्रयास किया गया और गांव के सभी वर्गों- धार्मिक मुखिया, राजनीतिज्ञ, सामाजिक कार्यकर्त्ता, सरकारी विभाग आदि के लोगों को शामिल करते हुए पौधरोपण को मान्यता दी गयी। आदि चुनचुनागिरी मठ के स्वर्गीय श्री श्री बालगंगाधर नाथ स्वामी जी, टोंटाडरया मठ के स्व0 श्री सिद्धालिंगेष्वर स्वामी जी, डम्बल, स्थानीय विधायक, पर्यावरणविद् एवं राजनेताओं आदि ने इस आयोजित उत्सव में भाग लिया और वृक्षारोपण एवं उनकी सुरक्षा के महत्व आदि के बारे में समुदाय को बताते हुए उन्हें इसके लिए उत्प्रेरित किया। अन्य दूसरे स्वैच्छिक संगठन, किसान समूह, स्वयं सहायता समूह एवं ग्राम स्तरीय संगठनों ने इस अवधारणा को दुहराया।
सामान्यतः जून-जुलाई महीनों के दौरान, समुदाय के साथ विचार-विमर्ष कर हसीरू हब्बा के लिए एक तिथि निर्धारित की गयी है। परियोजना से जुड़े हुए आस-पास के गांवों के लोग, स्कूली बच्चे, जन प्रतिनिधि एवं धार्मिक नेताओं को इस उत्सव में सहभाग करने हेतु आमंत्रित किया जाता है। पौधरोपण हेतु नर्सरी, तेजी से बढ़ने वाले पौधों के बीजों की ढुलाई, चयनित भूमि में गढ्ढों की खुदाई एवं अन्य व्यवस्थाएं आदि एक दिन पहले ही सुनिष्चित कर ली जायेंगी। उत्सव वाले दिन सुबह समुदाय के लोग एक जगह एकत्र होते हैं और जुलूस के रूप में पौधरोपण वाले क्षेत्र में जाते हैं, नर्सरी की पूजा करते हैं और पौधरोपण से पूर्व हसीरू हब्बा की शपथ लेते हैं (देखें बाक्स 1)।
| बाक्स 1 – हसीरूहब्बा शपथ ‘‘वृक्ष कृषि का एक अभिन्न अंग होते हैं। हम, ग्रामवासी, ग्रामदेवी के नाम से शपथ लेते हैं कि हम अपने गांव में प्रत्येक वर्ष हसीरूहब्बा का उत्सव मनायेंगे और जहां तक संभव हो, सामुदायिक सहयोग से पौधों को लगायेंगे एवं उनका संरक्षण करेंगे। हम इस हब्बा में अपने परिवार के सभी सदस्यों, रिष्तेदारों, मित्रों एवं आस-पास के गांववासियों को भी शामिल करेंगे।’’ |
विविध प्रजातियां एवं उनके प्रभाव
स्कूल परिसर और शैक्षणिक संस्थानों के आस-पास नीम का पेड़ लगाने से बीमारियों के रोक-थाम में मदद मिलेगी। कस्बों और शहरों में कदम्ब, बीलवारा तथा षिरीष के पौधे लगाने से वायु प्रदूषण के नियंत्रण में सहायता मिलेगी। चम्पा, चमेली और परिजात के पौधों को कूड़े-कचरे के ढेर तथा जल निकासी वाले स्थानों पर लगाने से इन स्थानों से निकलने वाली दुर्गन्ध को दूर किया जाता है। पीपल, गुलर, बरगद आदि वृक्षों के अन्दर वायु को स्वच्छ करने की क्षमता होती है इसलिए इन्हें पौधांे को पार्क और मन्दिर के परिसर में लगाया जा सकता है। बनारस हिन्दू विष्वविद्यालय द्वारा किये गये एक अध्ययन के अनुसार, कस्बों और शहरों में पतंग, शीषम, अमरूद और षिरीष के पौधे लगाने चाहिए, क्योंकि ये पौधे वायु प्रदूषण रोधी पौधे होते हैं।
खेत के चारों तरफ पेड़ों व वनस्पतियों से की गयी घेराबन्दी से कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलती है और इस प्रकार यह जलवायु परिवर्तन के विरूद्ध शमन की गतिविधि के तौर पर काम करता है। बरसात के मौसम में गिरिपुष्प, पंगरा, राईमुनिया या धनेरी आदि के पौधों की कटिंग करके उनका रोपण करते हुए बगीचों के चारों तरफ तथा खेत की मेड़ों पर पौधों/वनस्पतियों से घेराबन्दी तैयार की जा सकती है। इसके साथ ही तेजी से उगने वाले पौधे जैसे- अगस्त्य, बबूल एवं गिरिपुष्प के बीजों की बुवाई भी चारों तरफ मेड़ पर की जा सकती है। यह जल्द ही तैयार हो जायेगा। दूसरे वर्ष से लगातार, पौधों से तैयार चहारदीवारी से बड़ी मात्रा में बायोमॉस की उपलब्धता होने लगती है, जिसका उपयोग खाद बनाने में किया जा सकता है।। एक समय बीतने के बाद, चारों तरफ मेड़ पर स्थानीय प्रजातियां उगनी प्रारम्भ हो जाती है।
गिरिपुष्प, सुबबूल, पंगरा एवं अगस्त्य तेजी से उगने वाली प्रजातियां हैं और बरसात के दिनों में इनके बीजों की सीधे बुवाई की जा सकती है। इनसे एक तरफ चारा की आवष्यकता की पूर्ति होती है साथ ही बायोमॉस भी मिलता है, जिसे मृदा में समाहित किया जा सकता है। किसानों द्वारा इस कम लागत अभ्यास को अपनाने हेतु बीजों एवं उत्प्रेरणा की आवष्यकता है।
कर्नाटक राज्य जैव ईंधन विकास बोर्ड के माध्यम से कर्नाटक सरकार निजी और सरकारी भूमियों पर जैव ईंधन प्रजातियों को भी बढ़ावा दे रही है। हसीरू हन्नू एवं बराडू बांगरा परियोजनाओं के माध्यम से किसानों को कुछ प्रजातियों जैसे- करंज, सिमरौबा, जेट्रोफा, महुआ आदि के बीज उपलब्ध कराये गये। किसानों को इसे खेत के चारों तरफ मेड़ों पर तथा अकृषित भूमि पर लगाने हेतु उत्प्रेरित किया जा सकता है। बीज उत्पादन के अलावा, इससे बड़ी मात्रा में बायोमॉस तथा कूड़े के रूप में गिरे पत्तों को प्राप्त होगा। इसे खाद के रूप मंे बदल कर इसका प्रयोग खेतों में किया जा सकता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में रसायनिक खादों एवं कीटनाषकों का प्रयोग कम से कम होगा।
पहंुच का विस्तार
सार्वजनिक भूिमयों, स्कूल के प्रांगण, मन्दिर के प्रांगण, उसर भूमि, सड़क के दोनों किनारों आदि पर पौधरोपण करते हुए वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करने की आवष्यकता है। इसे समुदाय की संस्कृति में समाहित करने की आवष्यकता है परन्तु जोर-जबरदस्ती से नहीं। इसके लिए सषक्त सामुदायिक उत्प्रेरणा की आवष्यकता है। गांवों में, स्वयं सहायता समूहों, युवा क्लबों, स्कूल के बच्चों आदि को शामिल करते हुए एक स्थाई पौधरोपण गतिविधियों में लम्बा रास्ता तय किया जायेगा। सूखा क्षेत्रों के किसानों को कृषि-वानिकी एवं वृक्ष आधारित कृषिगत प्रणाली को अपनाने हेतु सहयोग करने की आवष्यकता है। स्थान की उपलब्धता पर निर्भर होने के बाद भी कम से कम एक अथवा दो पौधों का रोपण अपने घर के पिछवाड़े करना चाहिए। किसी भी सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए कम से कम 200-300 पौधों का रोपण करना अनिवार्य किया जाना चाहिए। अन्ततः यह पेड़ ही हैं, जो वायुमण्डल से कार्बन का अवषोषण करते हैं और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में मदद करते हैं।
एम एन कुलकर्णी
एम एन कुलकर्णी अतिरिक्त मुख्य कार्यक्रम अधिकारी बाएफ कोनुरू, लक्ष्मैया गली, मोगलाराजपुरम विजयवाडा, आंध्र प्रदेष ईमेलः mnkulkarni65@gmail.com
Source: Save the Planet, LEISA India, Vol.21, No.4, December 2019



