छोटी व सीमान्त जोत पर खेती करने वाली महिला किसानों ने खेती की अन्तःफसली तकनीक में छोटे-छोटे नवाचारों को अपनाकर न सिर्फ अपनी मुख्य फसल से होने वाली आय को दुगुना किया है, वरन् खेती में लगने वाली लागत में भी कमी की है। पष्चिमी चम्पारण के नौतन प्रखण्ड की किसान छठिया देवी ने इस सफलता को बखूबी दर्षाया है।
उत्तर प्रदेष और बिहार में अन्तः खेती खेती की एक सामान्य विधा है, जिसके अन्तर्गत किसान विविध फसलों की खेती एक निष्चित समयान्तराल पर एक साथ करते हैं। अन्तः खेती करने के पीछे किसानों की मंषा एक साथ दोहरा लाभ लेना होता है। अथवा यह भी कह सकते हैं कि अन्तः खेती कर किसान अपने खेती के जोखिम को कम करता है कि यदि किसी भी परिस्थितिवष एक फसल की क्षति हो जाये तो दूसरी फसल से उसकी भरपाई हो सके।
पिछले कुछ वर्षों में वर्षा, शीतकाल एवं ग्रीष्मकाल में बदलाव स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है और प्रत्येक ऋतु में फसलों पर मौसमों के पड़ने वाले दुष्प्रभाव भी दिखने लगे हैं। ऐसी स्थिति में परम्परागत तरीके से की जाने वाली अन्तः खेती पर भी व्यापक असर पड़ा है और पूर्व की भांति परिणाम नहीं प्राप्त हो रहा है। किसान उर्वरकों का प्रयोग तो अन्धाधुन्ध कर रहे, परन्तु उपज में वृद्धि नहीं हो रही। बिहार के जिला पष्चिमी चम्पारण के नौतन प्रखण्ड की बात करें तो यहाँ की मुख्य फसलें धान, मक्का व गन्ना है, परन्तु किसान इनकी एकल खेती ही करते हैं। खरीफ एवं जायद ऋतु में किसान मक्का की खेती मुख्य फसल के रूप में करते हैं, परन्तु रबी में मक्का की फसल नहीं लेते, क्योंकि जोत छोटी होती है और रबी में गेंहूं, सरसों, आलू एवं सब्ज़ियों की खेती करना इनकी प्राथमिकता में होती है। पिछले कई वर्षों से शीतकाल में भुट्टे के रूप में मक्का की मांग बढ़ी है, फिर भी किसान इसे एकल खेती के तौर पर करने में रूचि नहीं ले रहे थे, क्योंकि उन्हें खेत फंसने की चिन्ता बनी रहती है। ऐसी स्थिति में संस्था गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्षन ग्रुप ने कुछ उत्साही किसानों के साथ आलू व मक्का की अन्तःखेती करने की तकनीक पर बल दिया।
नवाचार
वर्ष 2018 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के वित्तीय सहयोग से जब स्वैच्छिक संगठन गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्षन ग्रुप ने उत्तर प्रदेष के गोरखपुर जनपद के विकासखण्ड कैम्पियरगंज एवं जंगल कौड़िया तथा बिहार के पष्चिमी चम्पारण जिले के नौतन प्रखण्ड में काम करना प्रारम्भ किया तो उपरोक्त मुद्दों को संज्ञान में लिया।
संस्था कार्यकर्त्ताओं ने किसानों के साथ बैठकें, किसान विद्यालय आदि का संचालन किया जहाँ पर किसानों की तरफ से आने वाली समस्याओं का समाधान स्वयं भी किया और कृषि विषेषज्ञों, कृषि वैज्ञानिकों से कराया। इसी दौरान यह समस्या सामने आयी कि रबी ऋतु में आलू यहां की एक मुख्य फसल है। मौसम परिवर्तन की वजह से आलू की खेती प्रभावित हो रही है और किसानों को हानि उठानी पड़ रही है। अतः कृषि विषेषज्ञों एवं अनुभवी किसानों के साथ मिलकर आलू एवं मक्का की अन्तः खेती करने पर विचार विमर्ष किया गया। व्यापक चर्चा करने के बाद किसानों ने आलू व मक्का की अन्तः खेती में छोटे-छोटे नवाचारों को अपनाकर खेती को लाभप्रद बनाने की दिषा में पहल की। पष्चिमी चम्पारण के नौतन प्रखण्ड के गांव जगदीषपुर बहुअरवा की मॉडल किसान छठिया देवी ने इसका सफल उदाहरण प्रस्तुत किया।
पहल
50 वर्षीय महिला किसान छठिया देवी के पास स्वयं का एक एकड़ खेत है, जिसपर उनके पांच सदस्यीय परिवार की आजीविका निर्भर करती है। छठिया देवी पहले भी अन्तः खेती करती थीं और निष्चित तौर पर आमदनी एकल खेती की अपेक्षा अधिक थी, परन्तु पिछले कुछ वर्षों से उन्हें यह अनुभव हो रहा था कि उपज में कोई बढ़ोत्तरी ही नहीं हो रही है। इसके पीछे क्या कारण है? यह तो उन्हें स्पष्ट नहीं हो पा रहा था, परन्तु वे इतना अवष्य मानती थीं कि मौसम में जो बदलाव हो रहा है, उससे फसल पर असर अवष्य पड़ रहा था। इसी समय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के कोर सपोर्ट परियोजना के अन्तर्गत गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्षन ग्रुप ने इस गांव में कार्य करना प्रारम्भ किया और छठिया देवी का जुड़ाव परियोजना से हुआ। समस्या के सन्दर्भ में विषेषज्ञों की सलाह पर छठिया देवी ने आलू व मक्का की अन्तः खेती में निम्न नवाचारों को अपनाया-
* आलू की बुवाई के समय में बदलाव किया। साधारणतया आलू की बुवाई अक्टूबर में होती है, परन्तु इन्होंने 10 नवम्बर के बाद बुवाई की और उसके अगले दिन ही मक्का की बुवाई कर दी।
* सामान्यतः मक्का की सीधी बुवाई की जाती है। परन्तु इन्होंने मक्के को पहले 12 घण्टों के लिए पानी में भिगो दिया। तत्पष्चात् बुवाई की। इससे एक तरफ तो बीजों का उपचार हुआ, दूसरी तरफ अंकुरण स्वस्थ हुआ और बीजों का जमाव भी जल्दी हुआ।
* आलू और मक्का के बीच की दूरी 18 इंच की रखते हैं, परन्तु इन्होंने 22 इंच की दूरी रखी ताकि दोनों को फलने-फूलने का पर्याप्त स्थान मिले।
* इसके साथ ही इन्होंने इस बार 10 कुन्तल कम्पोस्ट खाद में 1 किग्रा0 सी0पी0पी0 मिलाकर बुवाई से पहले खेत में मिला दिया।
छठिया देवी ने अपने 0.30 एकड़ खेत में उपरोक्त नवाचारों को अपनाकर आलू व मक्का की अन्तः खेती की, जिससे उन्हें निम्नवत् फायदे देखने को मिले-
* सबसे पहले तो इन्हें सिंचाई कम करनी पड़ी, क्योंकि मक्का का पौधा बड़ा होने से खेत की नमी बनी रहती है।
* आलू की फसल के ऊपर मक्के की छाया होने से आलू में पाला व झुलसा रोग का प्रकोप नहीं हुआ। इसके साथ ही अन्य रोगों से भी बचाव होता है।
* निराई-गुड़ाई, कम्पोस्ट एवं सिंचाई की लागत में कमी आयी, क्योंकि एक फसल में निराई-गुड़ाई करने से दूसरे फसल के लिए भी जमीन भुरभुरी हो गयी। कम्पोस्ट एवं सिंचाई भी एक फसल के लिए करने पर दोनों फसलों को लाभ हुआ। इस प्रकार एक लागत में ही इनको दो फसलों की उपज प्राप्त हुई, जिससे इनकी आमदनी में वृद्धि हुई।
* मार्च में आलू की फसल की खुदाई की गयी और जहां सामान्य विधि से इन्हें 14 कुन्तल आलू की उपज प्राप्त होती थी, वहीं इन नवाचारों को अपनाने के बाद इन्हें 40 कुन्तल आलू की उपज प्राप्त हुई।
* इनके द्वारा आलू व मक्का की अन्तः खेती में लगने वाले लागत एवं प्राप्त लाभ को निम्न तालिका सं0 1 के माध्यम से देखा जा सकता है-
तालिका सं0 1: आलू-मक्का की अन्तःखेती में लागत-लाभ का तुलनात्मक विवरण (0.30 एकड़ खेत)
| फसल | लागत के मद | उत्पादन | लाभ | शुद्ध लाभ | ||||||
| बीज
| सिंचाई
| निराई- गुड़ाई | उर्वरक कम्पोस्ट | खुदाई/ तुड़ाई | कुल लागत
| दर | कुल लाभ रू0 में | |||
| आलू | 1600 | 540 | 600 | 2550 | 2000 | 7290 | 40 कुन्तल | 00 रू0 1200.00प्रति कु | 40000 | 47500-10290=37210 |
| मक्का | 1500 |
| 3000 |
| 1500
| 3000 | 3000 भुट्टा | 2.50 | 7500 | |
|
| 10290 | 47500 | 37210 | |||||||
निष्कर्ष
बुवाई के समय में बदलाव करने से आलू की उपज पर विषेष प्रभाव पड़ा। इसी प्रकार मक्का के बीजों को भिगाकर बुवाई करने से 3-4 दिनों के अन्दर जमाव हो गया, जिससे पौधों एवं फलों की बढ़त पर सकारात्मक असर पड़ा। उपरोक्त अन्तः खेती को अपनाकर छठिया देवी ने न केवल अपनी लागत कम की वरन् लाभ में अनुमान से अधिक की वृद्धि की, जिससे उनके आत्मविष्वास में वृद्धि हुई है। यह कहानी मात्र छठिया देवी की नहीं है, वरन् उनकी खेती एवं पैदावार की बढ़त को देखकर गांव के ही एवं अन्य आस-पास के गांवों के बहुत से किसान अन्तः खेती में इन छोटे-छोटे नवाचारों को अपनाकर अपनी फसलों की उपज एवं आमदनी को बढ़ा रहे हैं और अपनी एवं अपने परिवार की आजीविका व रहन-सहन को सुदृढ़ कर रहे हैं। जरूरत है तो ऐसे प्रयासों को बड़े पैमाने पर प्रसारित करने की ताकि एक बड़ा खेतिहर समुदाय इससे लाभान्वित हो सके।
अर्चना श्रीवास्तव, अजय सिंह व रामसूरत
अर्चना श्रीवास्तव प्रोग्राम प्रोफेशनल्स गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन ग्रुप 224, पुर्दिलपुर, एम0जी0 कालेज रोड गोरखपुर - 273 001, उत्तर प्रदेश, भारत ई-मेल: ंतबींदंेतप844/हउंपसण्बवउ



