खेत से उच्च उत्पादन पाने के लिए जैविक

Updated on March 3, 2021

खेती में लगने वाली लागत को कम करने और एक स्थाई तरीके से उत्पादकता को बढ़ाने की नितान्त आवश्यकता है। ऐसे लक्ष्य को पूरा करने हेतु किसानों की मदद से नये प्रकार के कृषि-जैव निवेशों का उपयोग करते हुए 20-20 मॉडलों को तैयार किया जा सकता है। जैव-रसायनों एवं जैविक कीटनाशकों के साथ कृषि अपशिष्टों से तैयार वैज्ञानिक जैविक खाद ने पर्यावरणसम्मत तरीके एवं न्यूनतम लागत पर खेत की उत्पादकता को उन्नत बनाने की क्षमता को प्रदर्शित किया है।


यूनाइटेड नेशन्स के स्थाई विकास लक्ष्य इस बात पर ज्यादा जोर देते हैं कि हमारी वर्तमान निवेश केन्द्रित खाद्य प्रणाली को अधिक स्थाई प्रणाली में बदलने की आवश्यकता है। भारत जैसे देश में, जहां अभी भी बहुसंख्य आबादी कृषिगत आजीविका पर निर्भर है, वहां पारिस्थितिकी कृषिगत प्रणाली से खेती करना आगे का एक रास्ता हो सकता है। पारिस्थितिकी-कृषिगत अभ्यासों के माध्यम से भूख, कुपोषण, गरीबी, पर्यावरणीय ह्रास एवं जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से भी निपटा जा सकता है। पारिस्थितिकी-कृषि का अभी उदय हो रहा है। नयी पीढ़ी की जैव निवेश जैसे- जैव-रसायनों, जैव- कीटनाशकों एवं जैविक खादों आदि के विकास आने वाले दिनों में उल्लेखनीय भूमिका निभायेंगे।

8 मिलेनियम लक्ष्यों में से गरीबी एवं भूख का उन्मूलन तथा पर्यावरणीय स्थाईत्व शायद सबसे अधिक प्रमुख और पूरक लक्ष्य है। हरित क्रान्ति की वजह से भारत एवं अन्य बहुत से देशों में भोजन का संकट दूर हुआ और पर्याप्त/अधिक भोजन की उपलब्धता होने लगी, जो एक बड़ा बदलाव है। यदि हम कृषि के क्षेत्र में आने वाली उन चुनौतियों की बात करें, जिनका सामना अगले कुछ दशकों में किसानों को करना पड़ेगा तो यह स्पष्ट है कि प्रति व्यक्ति बहुत कम जमीन पर, कम पानी के साथ और पर्यावरणीय चुनौतियों को झेलते हुए वर्ष 2025 तक खाद्य उत्पादकता दुगुनी एवं वर्ष 2050 तक उत्पादन को तिगुना करना होगा। हालांकि कृषि परियोजनाओं का वर्तमान परिदृश्य एक धूमिल भविष्य है। भारतीय किसान कृषि निवेशों जैसे- बीज, उर्वरक, कीटनाशकों आदि पर लगभग 2 लाख करोड़ रूपये व्यय करते हैं। लगभग रू0 50000.00 करोड़ उर्वरक अनुदान में चले जाते हैं। रसायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मृदा उर्वरता में ह्रास होता है और हमारी मृदा में जैविक कार्बन की अत्यन्त आवश्यकता है।

यह समय एक स्थाई, संतुलित व किसान हितैषी पारिस्थितिकी-कृषिगत क्रान्ति का समय है। इस समय आसानी से एवं कम मूल्य पर उपलब्ध होने वाले पर्यावरणसम्मत एवं प्रभावी विकल्पों की अत्यन्त एवं त्वरित आवश्यकता है। सौभाग्य से कई नये/वैकल्पिक विकास बहुत आशान्वित करने वाले हैं।

वैकल्पिक मॉडल
कुछ वर्षों पहले, हमारी संस्था विज्ञान आश्रम के युवा वैज्ञानिकों के दल ने जब किसानों के साथ संवाद स्थापित किया तो वे कुछ अनपेक्षित प्रतिक्रिया के साथ मिले। अधिकांश क्षेत्रों में, भारी मात्रा में कीटनाशकों एवं रसायनों का उपयोग करने वाले किसान, इनके हानिकारक प्रभावों एवं घटते शुद्ध आमदनी तथा पर्यावरणीय समस्याओं के बारे में बात-चीत करने एवं सुनने के लिए तैयार थे। हालांकि वे यह भी कहते थे, ‘‘क्या इसका कोई विकल्प है?’’ जब उन्हें नये तरीके से तैयार किये गये कृषि जैव निवेशों के बारे में बताया गया तो उनका सीधा से जवाब था, ‘‘आप इसे बना दें और हमें दें। हम प्रयास करना चाहते है।’’ इस प्रकार टीम को गुजरात जीवन विज्ञान नाम से कृषि जैव निवेशों की एक उत्पादन इकाई प्रारम्भ करने को बाध्य होना पड़ा।
यह समय एक स्थाई, संतुलित व किसान हितैषी पारिस्थितिकी-कृषिगत क्रान्ति का समय है।

अब मल्टी माइक्रोबायल कन्सोर्टिया तकनीक के बारे में बेहतर समझ विकसित हो चुकी है जिससे एक तरफ तो फसल उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है और दूसरी तरफ कृषि रसायनिक निवेशों की लागत में कमी आयी है। इसके साथ ही, कृषि अपशिष्टों, फार्म यार्ड मेन्योर आदि से तैयार उच्च गुणवत्ता वाले जैव कम्पोस्ट आसानी से उपलब्ध भी हो जाते हैं और मानक के अनुसार गुणवत्ता सुनिश्चित करते हुए मृदा के लिए आवश्यक कार्बन तथा अन्य पोषक तत्वों की पूर्ति करते हैं। एक और चौंकाने वाला विकास जैव कीटनाशकों के क्षेत्र में हुआ है।

भारत, अफ्रीका और सुदूर पूर्वी देशों के विभिन्न भागों में प्रक्षेत्र प्रदर्शन अध्ययन हेतु 20: 20 मॉडलों के साथ कार्य किया गया। एक मॉडल में निवेश लागत में लगभग 20 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है और ठीक उसी समय उत्पादकता में 20 प्रतिशत तक की वृद्धि भी संभव है, जो विश्व के अधिकांश किसानों के लिए एक वरदान हो सकती है। यह वह मॉडल है, जिसे एक विकासवादी तरीके से आसानी से अपनाया जा सकता है।

हाल के दिनों में, 20: 20 मॉडल किसानों के लिए शायद सबसे अधिक व्यवहारिक एवं लोकप्रिय मॉडल के रूप मंे उभर रहा है। यह महसूस किया जा रहा है कि, यद्यपि पर्यावरणीय समस्या एवं रसायनिक खेती की उच्च लागत के बारे में सभी को पता है और सभी रसायनों को रातों-रात रोका या दूर नहीं किया जा सकता है। दूसरी तरफ, अचानक से पूरी तरह से जैविक खेती करने वाले किसानों को निराशा एवं समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उनके अन्दर असंतोष आ रहा है। इन दोनों तरीकों के बीच, 20ः20 के मॉडल ने एक व्यवहारिक और सकारात्मक तथा आसानी से अपनाया जाने वाला रास्ता दिखाया। यह भी देखा गया कि 20ः20 मॉडल का पहला वर्ष बीतने के पष्चात्, बहुत से प्रगतिषील किसानों द्वारा अगले दो वर्षों में बहुत जैविक निवेषों का उपयोग बहुत आसानी से दुगुना करते हुए शत-प्रतिषत जैविक उत्पादों को प्राप्त किया जा सकता है। ऐसे किसान अलग-अलग कृषि-जलवायुविक परिस्थितियों और भिन्न-भिन्न फसलों वाले हो सकते हैं।

तालिका 1: बहु सूक्ष्म जैविक उत्पादों, जैव-उर्वरकों एवं जैव खादों का उपयोग करते हुए विषिष्ट उत्पादकता वृद्धि के आंकड़े

फसलस्थानपरिणाम
केलाकृषि विष्वविद्यालय – नवसारी, त्रिची-तमिलनाडु20 प्रतिषत कम यूरिया के साथ 25 प्रतिषत अधिक उत्पादन
चावलबैंकाक-थाइलैण्ड, वापी-गुजरातउत्पादकता में 14-19 प्रतिषत तक की वृद्धि
मक्कागौटेंग-दक्षिणी अफ्रीका25 प्रतिषत अधिक उत्पादन, 25 प्रतिषत कम यूरिया की खपत
रेंड़ीकच्छ-गुजरातउपज में 17-22 प्रतिषत तक वृद्धि
पपीताउत्तरी गुजरातउपज में 21 प्रतिषत तक की वृद्धि

 

जैव कीटनाषक एवं जैव कवकनाषी के उपयोग से बीमारियों का नियंत्रण

फसलस्थानपरिणाम
बैगनसौराष्ट्र, त्रिची-तमिलनाडुमाईट-माईट नहीं के उपयोग से घुन पर नियंत्रण हुआ और 15 दिनों तक दुबारा छिड़काव करने की आवष्यकता नहीं थी।
कपासमध्य गुजरात, अलवर-राजस्थाननीम का उपयोग करने पर विभिन्न प्रकार के कीड़ों का 80-85 प्रतिषत नियंत्रण हुआ।
मूंगफलीसौराष्ट्रट्राइकोडर्मा के साथ सुपरलाइफ मिलाकर उपयोग करने से कवकजनित बीमारियों का 90 प्रतिषत तक नियंत्रण
गुलाबमॉरीशस, मध्य त्रिची-तमिलनाडुमाईट-माईट नहीं के उपयोग से माईट की समस्या से 90 प्रतिषत तक छुटकारा और बहुत अच्छी वृद्धि।
आलूमध्य गुजरात, बिहारमृदा में वण्डरलाइफ-जी का उपयोग करने से 94 प्रतिषत तक बीमारियों को नियन्त्रित किया गया और उपज में 22 प्रतिषत तक की वृद्धि दर्ज की गयी।

 

प्रक्षेत्र प्रदर्षन
मोटे तौर पर, जैव निवेषों को मुख्यतः तीन वर्गों – पोषण प्रबन्धन (जैव-उर्वरक, समृद्ध जैव-खाद, मृदा में जैव उर्वरकों एवं जैव कवकनाषी का बहु सूक्ष्म जीवाष्म संयोजन), जैव-कीटनाषक (बहु सूक्ष्म जीवाष्म जैव-कीटनाषक, वानस्पतिक, फेरोमोन्स आदि) एवं विकास वृद्धिकारक (अमीनो एसिड, सूक्ष्म पोषक तत्व, समुद्री शैवाल के अर्क, विकास को बढ़ावा देने वाले और हार्मोन आदि) में बांटा गया है। इससे एक तरफ तो उत्पादकता में वृद्धि संभव है, दूसरी तरफ कृषि जैव उत्पादों के उपयोग के माध्यम से खेती की लागत में भी कमी आयेगी।

एक कृषि विष्वविद्यालय, एक प्राइवेट बायोटेक कम्पनी और एक स्वयंसेवी संगठन तीनांे को मिलाकर प्रक्षेत्र प्रदर्षनों का आयोजन किया गया। ये तीन सहभागी थे – नवसारी कृषि विष्वविद्यालय, एक नयी कृषि एवं इनवायरो बायोटेक कम्पनी-दक्षिण गुजरात, गुजरात लाइफ साइन्स (प्राइवेट) लिमिटेड एवं द साइन्स आश्रम नामक किसानों के साथ काम करने वाली एक स्वयंसेवी संगठन। प्रक्षेत्र प्रदर्षनों के लिए विभिन्न प्रकार के उत्पादों को लिया गया था। समृद्ध जैव कम्पोस्ट, जैव कीटनाषक, जैव उर्वरक आदि कुछ विषिष्ट जैव उत्पादों में शामिल थे।

हस्तक्षेप करने के दौरान प्राप्त आंकड़ांे के आधार पर यह स्पष्ट रूप से स्थापित किया गया है कि उत्पादकता में वृद्धि हुई और कृषि-रसायनों की लागत में कमी आयी है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि किसानों को एक ऐसा व्यापक मॉडल उपलब्ध कराया जा सकता है, जिसमें एक ही समय में कृषि निवेषों की लागत में पर्याप्त कमी और उत्पादकता में वृद्धि को हासिल किया जा सकता है। यह पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण सम्मत निवेषों के माध्यम से पूरा किया जा सकता है और स्थाई कृषि अभ्यासों के लिए एक अन्य दूसरी बड़ी उपलब्धि है।

यह ध्यान दिया जा सकता है कि इस मॉडल की व्याख्या करने में, कुछ विषिष्ट जैव उत्पादों के लिए आंकड़े संकेत के रूप में दिये गये हैं। किसी भी मानक आपूर्तिकर्ताओं से सही संयोजनों का प्रयोग किया जा सकता है। किसान मानकपूर्ण माइक्रोबियल कल्चर का उपयोग अपने खेतों के अपषिष्ट तथा पषुषाला के अपषिष्टों से अपना स्वयं का जैविक खाद तैयार कर सकते हैं।

प्राकृतिक रूप से फसल अपषिष्टों से जैव-कम्पोस्ट तैयार करना
फसल अपषिष्टों को जलाना एवं मृदा में जैव कार्बनों की अपर्याप्त मात्रा आज पूरे विष्व की समस्या है। उत्तर भारतीय राज्यों में बड़े पैमाने पर फसल अपषिष्टों को जलाने का काम किया जाता है, जिससे मृदा स्वास्थ्य का क्षरण, वायु प्रदूषण एवं स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इन क्षेत्रों के किसान धान की कटाई के 20 दिनों बाद ही गेंहूं की बुवाई करने के लिए खेतों में ही फसल अपषिष्टों को जलाने का काम करते हैं।

कई वर्षों तक प्रक्षेत्र में काम और शोध एवं प्रदर्षन करने से संकेत मिलता है कि बहु माइक्रोबियल मिश्रण के साथ प्राकृतिक तौर पर बायो-कम्पोस्टिंग फसल अवषेषों से निपटने के लिए सबसे अच्छा और व्यवहारिक समाधान प्रदान करता है। बहु माइक्रोबियल मिश्रण का उपयोग करते हुए हरियाणा के एक खेत में चावल के डण्ठल पर प्राकृतिक उपचार पर एक क्षेत्र प्रदर्षन किया गया।

केले एवं अन्य फसल अपषिष्टों के निपटान की समस्या बढ़ रही है। प्रायः किसानों की चर्चा में केला की कटाई के बाद उसके अपषिष्टों का निपटान एक बड़ी समस्या के तौर पर उभर कर आया। गुजरात में आणंद और तमिलनाडु में त्रिची जैसे कुछ महत्वपूर्ण सघन क्षेत्रों में बैठकें की गयीं। ये दोनों क्षेत्र केले की अत्यधिक मात्रा में खेती के लिए जाने जाते हैं। केले के फल की तुड़ाई करने के पष्चात्, उसके तना और अन्य अवषेषों को सामान्यतः सड़कों के किनारे फेंक दिया जाता है। बाद में श्रम की कमी के कारण यह भी मुष्किल हो गया।

किसानों के साथ बात-चीत करते समय यह महसूस किया गया कि केले की तुड़ाई के बाद अवषेषों के पुनर्चक्रीकरण करने पर जोर देने हेतु एक प्रणाली की आवष्यकता है। केले की तनों में अधिक मात्रा में में पानी होने के कारण प्राकृतिक तरीके से मृदा संवर्धन के लिए बायोमॉस के उपयोग पर अधिक जोर दिया गया। बड़ोदरा-आणंद केला क्षेत्र के बीच एक केले के खेत में बहु माइक्रोबियल मिश्रण का उपयोग कर एक प्रक्षेत्र प्रदर्षन किया गया।
परिणाम स्पष्ट हैं। 20 दिनों के भीतर, कृषि अपषिष्टों जैसे- चावल का भूसा, केला का अपषिष्ट का आंषिक अपघटन हुआ था। मृदा के भीतर कार्बन/नाईट्रोजन का अनुपात कम हुआ और जलधारण क्षमता में सुधार हुआ। इसके अतिरिक्त, श्रम लागत और निवेष लागत की बचत और सूक्ष्म पोषण की बेहतर प्रतिधारण क्षमता जैसे प्राकृतिक उपचार के दूसरे फायदे भी हैं।

निष्कर्ष
कई स्थितियों में और भिन्न-भिन्न कृषि-जलवायुविक परिस्थितियों में यह देखा गया कि अच्छी जैविक खाद का उचित प्रयोग और उपयोग पारम्परिक के साथ ही साथ जैविक खेती अभ्यास दोनों में विभिन्न फसलों के उच्च और स्थाई उत्पादन के लिए मुख्य और शायद सबसे अधिक महत्वपूर्ण निवेष है। वास्तव में, जैविक खादों के उचित प्रबन्धन और उपयोग के बिना जैविक खेती व्यवहारिक नहीं हो सकती। बहु माइक्रोबियल के साथ वैज्ञानिक जैव-कम्पोस्टिंग, स्थाई खेती के लिए एक अत्यधिक मूल्यवान कृषि निवेष तैयार करना एक मानक अभ्यास बन जाना चाहिए।

यह विकसित करना और प्रदर्षित करना सम्भव हो गया है कि अजोटोबैक्टर, अजोस्पीरिलियम, टोरूलोस्पोराग्लोबोसा, बैसिलियस कोआगुलन्स, सेलुलोमोनस एसपीएस, प्लेरोटस एसपीएस आदि के विभिन्न संयोजनों को मिलाकर बहु माइक्रोबियल कन्सोर्टिया कल्चर मिलाकर उपयोग करने से एक स्थाई तरीके से उत्पादकता वृद्धि करने में बहुत प्रभावी हो सकती है। कृषि अपषिष्टों में उपयोग करने पर इन कल्चरों का मुख्य कार्य नाइट्रोजन स्थिरीकरण, पोटैषियम घुलनषील, पौध विकास एवं कवक विरोधी गतिविधि होती है।

ये जैव निवेष कम लागत, किसान अनुकूल एवं पर्यावरणसम्मत होते हैं और स्थाई कृषि के लिए एक वरदान हैं। पहले की मान्यताओं के विपरीत, इसने बिहार, राजस्थान, तमिलनाडु, कच्छ-गुजरात आदि बहुत से विभिन्न परिस्थितियों में उच्च उत्पादकता स्पष्ट रूप से प्रदर्षित की है। वास्तव में, यह साबित किया गया है कि संकट के दौरान, नयी एवं उचित तकनीकंे छोटे और मझोले किसानों द्वारा तीव्र गति से अपनाई गयी हैं। और यहां तक कि ये मॉडल असिंचित क्षेत्रों में लागत प्रभावी एवं पर्यावरणसम्मत हैं।

सन्दर्भ
मेहता एम एच, ‘पारिस्थितिकी कृषि क्रान्ति – व्यवहारिक सीखें और आगे का रास्ता’, 2017, न्यू इण्डिया पब्लिषिंग एजेन्सी (एनआईपीए) (www.nipabooks.com)
अहलावत आर.पी.एस. एवं अन्य ‘‘विभिन्न फसलों के लिए जैविक खेती का वैज्ञानिक पैकेज’’, नवम्बर, 2007, एग्रोनामी पर नैनीताल कान्फ्रेन्स, नवसारी।
मेहता एम.एच.,‘‘20-20 मॉडल बुक, एग्रीकल्चर इयर बुक-2009’’

एम एच मेहता


एम एच मेहता
अध्यक्ष- पारिस्थितिकी कृषि पर वर्किंग ग्रुप- आईसीएफए, नई दिल्ली
पूर्व कुलपति, गुजरात कृषि विष्वविद्यालय
द साइन्स आश्रम/गुजरात लाइफ साइन्सेज- वडोदरा (गुजरात)
Email: chairman@glsbiotech.com, www.glsbiotech.com

Source: Biological Crop Management, LEISA India, Vol. 20, No.2, June 2018

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