एक छोटे से सहयोग के साथ पारम्परिक के स्थान जैविक पद्धति से खेती करना संभव है। उड़ीसा के एक आदिवासी किसान गोलपी की कहानी ने इसे सिद्ध किया है। गोलपी न केवल कपास की जैविक खेती करने वाली एक किसान हैं, वरन् ये अन्य फसलों में खेती की पारिस्थितिकी तरीके को अपनाते हुए अपने खेत की स्थिरता का बढ़ा रही हैं।
लगभग 35 वर्ष की गोलपी इल्ला एक आदिवासी महिला है और उड़ीसा के रायगड़ा जिले के मुनिगुडा प्रखण्ड में बदमंजुर्कुपा गांव में रहती हैं। इनकी शादी 17 वर्ष की उम्र में ही हो गयी थी और ये अपने 6 बच्चों व पति के साथ रहती हैं। इनकी आजीविका का मुख्य स्रोत खेती है और इनके पास अपना स्वयं का चार एकड़ खेत है। कुछ वर्षों पहले तक, इनका परिवार मुख्य रूप से पारम्परिक कृषि पर निर्भर करता था।
सिंचाई की सुविधाओं का अभाव होने के कारण यह खरीफ ऋतु में सिर्फ धान उगाती थीं। धान की कटाई के बाद खेत में पर्याप्त नमी रहने की स्थिति में कभी-कभी रबी ऋतु में भी कुछ फसलें उगा लेती थीं। बहुत बार बारिष न होने अथवा देर से बरसात होने के कारण धान की फसल भी नहीं हो पाती थी। सूखा की स्थितियों से निपटने हेतु इनके पास कोई व्यवस्था नहीं थी और तब इन्हें निकट के कस्बे अम्बादोला में कृषिगत मजदूरी करने के मजबूर होना पड़ता था। बहुधा गोलपी के पति काम के तलाष में उड़ीसा से बाहर अन्य राज्यों में पलायन भी करते थे। इनके लिए 8 सदस्यों के परिवार के भरण-पोषण का प्रबन्ध करना काफी मुष्किल कार्य था।
जैविक सफर
वर्ष 2011 में, एक स्वयंसेवी संगठन चेतना जैविक ने जैविक खाद्य उत्पादन को प्रोत्साहित करने हेतु बदमंजुर्कुपा गांव में अरहर की खेती के कार्यक्रम को शुरू किया। किसानों को चना की खेती करने के उन्नत तरीकों पर प्रषिक्षित किया गया। चना को मक्का की खेती में एक अन्तः खेती के तौर पर प्रोत्साहित किया गया।
वर्ष 2013 में, महिला किसान सषक्तिकरण परियोजना कार्यक्रम का क्रियान्वयन किया गया। महिला किसान सषक्तिकरण परियोजना आजीविका संवर्धन और नाजुकता को कम करने के लिए भारत सरकार द्वारा चलाई जा रहे कार्यक्रम राष्ट्रीय आजीविका ग्रामीण मिषन का एक उप कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देष्य खेती में महिलाओं की सहभागिता एवं उत्पादकता बढ़ाने हेतु कृषि में व्यवस्थित निवेष करने के माध्यम से महिलाओं को सषक्त बनाना था साथ ही ग्रामीण महिलाओं के लिए स्थाई कृषि आधारित आजीविका के अवसरों को तैयार करना भी था। कार्यक्रम के एक भाग के तौर पर, महिलाओं को संगठित किया गया और अक्टूबर 2013 में मां भैरबी नामक स्वयं सहायता समूह का गठन किया गया। गोलपी समूह की एक सदस्य थी। समूह सषक्तिकरण, जैविक खेती एवं कम्पोस्ट बनाना एवं अन्य विषयों पर स्वयं सहायता समूह का सषक्तिकरण किया गया। गोलपी को कृषि पद्धतियों एवं घर-परिवार के साथ-साथ एक किसान के तौर पर अपनी खेती को प्रबन्धित करने के ऊपर प्रषिक्षित किया गया।
अप्रैल 2015 में, इन समस्याओं को पहचान कर चेतना जैविक ने ट्रेडीक्राफ्ट एक्सचेन्ज, यूके एवं द बिग लॉटरी, यूके के सहयोग से ‘‘स्थाई खेत, स्थाई भविष्य’’ नामक एक परियोजना के अन्तर्गत समुदाय के बीच काम करना प्रारम्भ कर दिया। दक्षिणी-पष्चिमी उड़ीसा के दो जिलों में कपास की खेती करने वाले परिवारों की नाजुकता को कम करना तथा खाद्य सुरक्षा को बढ़ाना इस कार्यक्रम का व्यापक उद्देष्य था। इस परियोजना को इस प्रकार डिजाइन किया गया था कि इससे छोटे-मझोले किसानों द्वारा उच्च जोखिम भरे, उच्च लागत वाले और अस्थाई कपास की खेती करने वाले छोटे-मझोले किसानों की समस्याओं के ऊपर काम किया जा सके। इसका एक दूसरा पहलू यह भी था कि इस परियोजना के माध्यम से छोटे पैमाने पर कपास की खेती करने वाली महिला किसानों की सूचनाओं, तकनीक एवं आय अर्जन विकल्पों तक पहुंच बढ़ाई जाये, जिससे स्वामित्व और पहुंच बढ़ने तथा संसाधनों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण के माध्यम से परिवार में उनकी स्थिति बेहतर हो सके।
तालिका 1: कपास में अन्तःखेती और उनके फायदे
| अन्तःफसलें | अनुपात (कपास: अन्तःफसल) | फायदे |
| अरहर | 10:2 | अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होती है, मुख्य फसल बरबाद होने की स्थिति में फसल बीमा के तौर पर होती है, मृदा उर्वरता उन्नत होती है। |
| मूंग/उड़द/ चना | 15:1 | अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होती है, कीटों को चूस लेती है, नाइट्रोजन के रूप में मृदा उर्वरता उन्नत होती है। |
| ट्रैप फसलें | गेंदा, सूरजमुखी कहीं-कहीं बुवाई एक अमेरिकन कीट के लिए ट्रैप फसल के तौर पर है, अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होती है। | |
| भिण्डी | क्हीं-कहीं बुवाई | एरिस/स्पॉटेड बोलवार्म के लिए ट्रैप फसल के तौर पर है, अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होती है। |
| अरण्डी | मेड़ पर बुवाई तथा कपास में कहीं-कहीं बीच में बुवाई | स्पोडोपेट्रा के लिए ट्रैप फसल है, अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होती है। |
| मेड़ की फसलें | ||
| मक्का, ज्वार | मेड़ पर बुवाई | प्राकृतिक दुष्मनों/परागणों को बढ़ावा देता है, अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होती है
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2015 तक, गोलपी धान, दलहन, मोटे अनाजों एवं मक्का की खेती करती थीं। 2015 में, चेतना जैविक के सहयोग से उन्होंने कपास की जैविक खेती करनी प्रारम्भ की। उन्हें कपास की खेती के विभिन्न जैविक पद्धतियों के ऊपर प्रषिक्षित किया गया। प्रषिक्षणों का आयोजन कपास की खेती से पहले, कपास की खेती के दौरान एवं कपास की खेती के बाद भी किया गया। प्रषिक्षणों के साथ उन्हें कम दामों पर कपास की गैर जीएमओ बीज एवं जैविक कपास के विपणन पर भी सहयोग किया गया। इसके अतिरिक्त, उन्हें स्वयं सहायता समूह सषक्तिकरण, नेतृत्व, संचार एवं जेण्डर के मुद्दों पर भी प्रषिक्षित किया गया।
जैविक पहल
किसानों को जैविक खेती की तरफ प्रोत्साहित करने एवं उन्हें सक्षम बनाने हेतु परियोजना द्वारा बहुत से पहल किये गये। उदाहरण के तौर पर, जल प्रयोग क्षमता एवं उत्पादकता को उन्नत बनाने के लिए तालाबों की गाद का प्रयोग एक जैविक परिवर्तन के रूप में किया गया। किसानों ने गांव में उन तालाबों को चिन्हित किया, जहां पर पर्याप्त मात्रा में स्वस्थ गाद थी। इन चिन्हित तालाबों से नमूनों को एकत्र किया गया और मृदा में जैविक कार्बन की मात्रा एवं अन्य सामग्रियों की स्थिति को जानने के लिए प्रयोगषालाओं में परीक्षण हेतु भेजा गया। इसके बाद, प्रयोगषाला से एक बार सकारात्मक परिणाम प्राप्त होने के बाद किसानों को तालाबों की मिट्टी को अपने खेतों में डालने हेतु संस्तुत किया गया। प्रत्येक किसान को यह बताया गया कि वे अपने एक एकड़ खेत में कम से कम 10 टन गाद को डालें। गोलपी ने वर्ष 2017-18 में अपने एक एकड़ खेत में 16 ट्रैक्टर गाद डाला। गांव से एक किमी0 दूर स्थित बाराघाटी डैम से तालाब की गाद को निकाला गया। सरकार द्वारा तालाबों के पुनर्नवीनीकरण का कार्य पंचायतों के माध्यम से कराये जाने के कारण गाद को निकालना आसान हो गया था।
विविध फसल प्रणाली को बढ़ावा देने की एक दूसरी रणनीति अपनायी गयी। विविधता आधारित फसल प्रणाली को प्रोत्साहित करने से किसानों की आय बढ़ने के साथ ही उनके परिवार की खाद्य सुरक्षा तैयार करने में भी सहायता मिलती है। पहले, गोलपी का परिवार धान की खेती परिवार के उपयोग के लिए तथा कपास की खेती बाजार के लिए करता था। कपास की एकल खेती की जाती थी।
अब कपास के साथ अन्तः खेती के रूप में चना उगाने से न केवल मृदा उर्वरता बढ़ती है, वरन् यह मुख्य फसल के खराब होने की स्थिति में फसल बीमा के रूप में भी काम करता है। कपास के साथ मूंग, उड़द और चना की खेती की जाती है, जिससे परिवार को पोषणयुक्त दलहन उपलब्ध होता है। गेंदा, गुलाब एवं अरण्डी को कीट नियंत्रक फसल के रूप में लगतो हैं। परागणकर्ताओं की उपस्थिति को बढ़ाने के लिए मक्का और बाजरा को फसल के चारों तरफ लगाते हैं।
फसल के चारों तरफ अरण्डी एवं मक्का की फसल लगाने से कपास की फसल में कीट लगने की घटनाओं में कमी आयी।
किसानों को तरल खाद का उपयोग करने हेतु प्रोत्साहित किया गया। क्योंकि यदि मृदा में तरल खाद का उपयोग किया जाये तो पौधे अपनी पत्तियों के माध्यम से 20 गुना अधिक तेजी से पोषण अवषोषित कर सकते हैं। खेत के अपषिष्टों से बनी खाद अथवा पौधों की पत्तियों को कुछ दिनों अथवा कुछ हफ्तों तक पानी में सड़ाकर तरल खाद तैयार की जाती है। लगातार धीरे-धीरे चलाने से आक्सीजन उत्सर्जित होती है, जिससे सूक्ष्म जैविक गतिविधियां अधिक होती हैं। परिणामस्वरूप तरल खाद को या तो पत्तियों पर छिड़काव किया जा सकता है या मृदा में उपयोग किया जा सकता है। पंचगव्य, अम्रुतपानी, जीवामु्रत एवं वर्मीवाष जैसे तरल खादों को गोलपी ने वृद्धि एवं प्रजनन के दौरान उपयोग किया। ये तरल खाद/वृद्धिकारक हार्मोन्स में बहुत से सूक्ष्म और अति सूक्ष्म पोषक होते हैं, जिससे फसलों की वृद्धि एवं उत्पादन में सहायता मिलती है।
गोलपी ने कपास और अन्य दूसरी फसलों में कीट नियंत्रण करने हेतु बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। चेतना ने गोलपी को कीट प्रबन्धन तकनीकों पर प्रषिक्षण देकर इन चुनौतियों से निपटने में सहायता की। जैव कीटनाषकों को बनाने तथा कीट लगी फसलों पर उसके उपयोग जैसे विषयों पर जानकारी प्राप्त करते हुए उन्हें विभिन्न तकनीकों को सीखने में मदद मिली, जिससे जैव कीटनाषकों एवं उनकी प्रासंगिकता पर उनकी जानकारी में भी वृद्धि हुई। उन्होंने कपास एवं अन्य फसलों में कीटों के प्रबन्धन हेतु एक विकल्प के तौर पर नीम बीज करनेल के रस एवं मिर्चा-लहसुन स्प्रे को तैयार कर उसका उपयोग किया। फसलों के चारों तरफ अरण्डी एवं मक्का को लगाने से कीट लगने की घटनाओं को कम करने में सहायता मिली। गोलपी ने हाथ से लार्वा को हटाना, डण्डे से पीटना और पेड़ को हिलाकर लार्वा को गिराना जैसी यांत्रिक तरीकों को भी अपनाया।
कुछ प्रभाव
इन जैविक माध्यमों को लगातार अपना कर गोलपी ने न केवल कुछ फसलों में वरन् विविध फसलों में पहले से बेहतर उपज प्राप्त की। उन्होंने पहले वर्ष में 2 एकड़ खेत में कपास की खेती की और 4 कुन्तल की उपज प्राप्त की। दूसरे वर्ष में, उपज बढ़कर 7 कुन्तल हो गयी और तीसरे वर्ष में यह उपज बढ़कर 12 कुन्तल हो गयी। चेतना जैविक के सहयोग से कपास की खेती करने तथा अन्य विभिन्न प्रोत्साहनपूर्ण गतिविधियों को अपनाकर गोलपी के परिवार ने पिछले वर्षों की तुलना में अपनी आमदनी को तिगुना किया। तालिका 2 के माध्यम से क्षेत्र में फसल की उपज में औसत वृद्धि को दर्षाया गया है-
तालिका 2: जैविक उत्पादन प्रणाली के साथ फसल उपज में वृद्धि
| क्रमांक | फसल का प्रकार | कुन्तल/एकड़ में उत्पादन | कुन्तल/एकड़ में उत्पादन |
| बदलाव से पहले | बदलाव के बाद | ||
| 1 | कपास | 3-4 | 7-8 |
| 2 | धान | 8-10 | 12-14 |
| 3 | धान (श्री विधि से) | – | 18-20 |
| 4 | टांगुन | 2-3 | 5-6 |
| 5 | अरहर | 2-3 | 4-5 |
| 6 | मूंग | 2-3 | 3-5 |
| 7 | उड़द | 2 | 4-5 |
| 8 | चना | 4 | 6-7 |
| 9 | मूंगफली | 5.5 | 7 |
| 10 | टमाटर | 20-30 | 50-60 |
| 11 | बैगन | 35-40 | 50-60 |
क्षमता वर्धन प्रयासांे से गोलपी जैसे परिवारों के आत्मविष्वास में वृद्धि हुई। चेतना द्वारा एमकेएसपी एवं एसएफएसएफ जैसी परियोजनाओं के माध्यम से टाटा ट्रस्ट जैसी एजेन्सियों से जुड़ाव स्थापित कर किसानों की जमीन की उत्पादकता को बढ़ाने में सहायता मिली। गोलपी अब एक प्रमाणित जैविक किसान है। विभिन्न प्रखण्ड एवं जिला स्तरीय फोरमों पर प्रषिक्षणांे एवं बैठकों में सहभागिता करने के कारण उनकी नेतृत्व गुणवत्ता में भी वृद्धि हुई है। परिवार एवं समुदाय स्तर पर उनका महत्व बढ़ा है, अब उनके निर्णयों को लोग मानने लगे हैं। वे अपने गांव के विभिन्न समूहों के सदस्यों के साथ मिलकर विभिन्न सामाजिक मुद्दों के ऊपर कार्य करने में सक्षम हुई हैं। उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति उन्नत हुई है और वे समाज में अधिक सम्मानजनक जीवन जी रही हैं।
वाई एम एम सिरकर एवं देबाषीष मोहापात्रा
वाई एम एम श्रीकर निदेषक- कार्यक्रम चेतना जैविक किसान संघ 3-5-703/4, विट्ठलवाडी, नारायनगुडा, हैदराबाद, तेलंगाना, भारत-500 029 ईमेल:srikar@chetnaorganic.org.in देबाषीष मोहापात्रा आपूर्ति श्रंृखला विषेषज्ञ ट्रेडीक्राफ्ट इण्डिया, दूसरा तल, बाधे हाउस 6-3-788/36 एवं 37 ए, दुर्गानगर, आमेरपेट, हैदराबाद-16 ईमेल: mohapatra.debasis@gmail.com
Source: Biological Crop Management, LEISA India, Vol. 20, No.2, June 2021



