भूमि सुधा मृदा उर्वरता को बढ़ाने के लिए बायोमॉस का पुनर्चक्रीकरण

Updated on March 1, 2021

झारखण्ड में खूंटी और रांची जिलों के किसान अपने फलों के बगीचों में बायोमॉस पैदा करने वाले पौधों को शामिल कर लाभान्वित हो रहे हैं। पौधों की नालियों में बायोमॉस की मल्चिंग करने से मृदा नमी, मृदा पोषण एवं जीवाष्मों की मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि पायी गयी है, जो पौधों की बढ़त एवं उपज में वृद्धि के रूप में प्रदर्षित होती है।


भारत के पूर्वी पठार एवं पहाड़ी क्षेत्र बड़े पैमाने पर फलदार फसलों की खेती सफलतापूर्वक करने हेतु उपयुक्त जलवायुविक परिस्थितियां प्रदान करते हैं। यद्वपि इन क्षेत्रों में पर्याप्त वर्षा होने के कारण, मृदा में जैविक कार्बन की कमी, मृदा की खराब जलधारण क्षमता, अम्लीय मृदा एवं फासफोरस, बोरान एवं जिंक जैसे पोषक तत्वों की कमी आदि की समस्याएं उत्पन्न होती हैं, जिससे विषेषकर वर्षा की स्थितियों में विभिन्न फलदार फसलों की वृद्धि और उत्पादकता पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इन उष्णकटिबंधीय वातावरण में अधिकांषतः मिट्टी में उच्च अम्लता और एल्यूमिनियम विषाक्तता है और यहां की मिट्टी में आक्साइड प्रचुर मात्रा में तथा पोषक तत्वों की कमी पायी जाती है। इसलिए, यहां पर कृषिगत उत्पादन लागत का एक बड़ा हिस्सा चूना और रसायनिक उर्वरकों पर व्यय होता है।

इस क्षेत्र में मृदा में कार्बनिक कार्बन सामग्री की मात्रा बढ़ाने की दिषा में फलदार फसलों की उत्पादकता बढ़ाने हेतु कोई भी प्रयास करना प्रमुखता से होना चाहिए। उष्ण कटिबन्धीय आर्द्र और उप आर्द्र क्षेत्रों में मृदा में सड़न की प्रक्रिया देर से होने के कारण मृदा में कार्बनिक तत्वों में यथास्थिति बनाये रखना या सुधार करना एक प्रमुख चुनौती है। मृदा में कार्बनिक तत्वों की कमी से निपटने तथा समग्र रूप से मृदा गुणवत्ता बढ़ाने के लिए मिट्टी की कम जुताई एवं पौध अपषिष्टों के उच्च निवेष का संयुक्त कृषिगत प्रणाली एक प्रभावी विकल्प है। हाल के वर्षों में कार्बनिक खाद की लागत बढ़ने के कारण खेतों में इनका प्रयोग धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। भारत के पूर्वी पठारी क्षेत्रों के किसान अपने खेतों में आसानी से उपलब्ध होने वाले कार्बनिक खादों का उपयोग करते हैं और अपने फलों के बगीचे में तो वे कार्बनिक खादों का उपयोग बहुत कम ही करते हैं। हालांकि बगीचों के लिए हरी खाद वाले फसलों जैसे ढैंचा उपलब्ध हैं, सिर्फ बारिष के दिनों में ही उगाये जाने के कारण फलदार बगीचों के लिए उनका उत्पादन चक्र एक प्रमुख बाधा है। ठीक इसी प्रकार, अकार्बनिक उर्वरकों की लागत बढ़ते रहने के कारण, अधिकांष छोटी जोत वाले किसानों द्वारा उसका प्रयोग पर्याप्त मात्रा में नहीं किया जा पाता और यही कारण है कि एकीकृत मृदा उर्वरता प्रबन्धन प्रणाली विकसित करने के प्रति उनकी रूचि बढ़ी है।

फसल प्रणालियों में बायोमॉस उत्पादित करने वाले पौधे
मृदा की उर्वरता में सुधार लाने के लिए मुख्य फसल के लिए पत्तेदार बायोमॉस के अलावा फसल उत्पादन प्रणाली में बायोमॉस उपजाने वाले पौधों को समाहित करना काफी प्रभावी पाया गया है। मेड़ों पर खेती प्रणाली में बायोमॉस उत्पादित करने वाली प्रजातियों की उपस्थिति से पोषण पुनर्चक्रीकरण, मृदा में पोषण के रिसाव में कमी, मृदा में उच्च जैविक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने, मृदा क्षरण को रोकने, मृदा उर्वरता को बढ़ाने तथा फसल उत्पादकता का स्तर स्थाई बनाये रखने में सहयोग प्राप्त होता है। पेड़ों से छंटनी की गयी सामग्रियों की मात्रा और गुणवत्ता, अपघटन प्रक्रिया के दौरान अपषिष्टों से निकले पोषणों की मात्रा तथा उत्सर्जित पोषण एवं फसल की आवष्यकता के बीच सामंजस्य के आधार पर मेड़ों पर खेती प्रणाली आधारित पोषण पुनर्चक्रीकरण की सफलता निर्भर करती है। मिट्टी की गहराई से पोषण लेने की क्रिया मंे वृद्धि करने हेतु गहरी जड़ प्रणाली के साथ दलहनी पौधों का रोपण, नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते हुए नाइट्रोजन का निवेष आदि पर विचार करना खेत पर पोषण चक्र को उन्नत बनाने के लिए एक सर्वाधिक प्रभावी तरीका है। अधिकांष कृषि-वानिकी प्रणाली अपने बायोमॉस में फासफोरस को जमा करते हैं और जब वे विघटित होते हैं तो मृदा को वही फासफोरस पुनः वापस कर देते हैं। चक्रीकरण के माध्यम से, फासफोरस की कम उपलब्धता वाले कुछ अकार्बनिक रूपों को संभावित उपलब्ध रूपों में मृदा में बदल दिया जाता

भूमिसुधा: एक संभावित बायोमॉस उपज पौध
यह देखा गया है कि मृदा के पोषक तत्वों को पुनर्चक्रीकरण में बायोमॉस उपजाने वाले कई बारहमासी पौधे काफी प्रभावकारी होते हैं। सुबबूल के पौधांे का मेड़ों पर रोपण उप आर्द्र उप उष्णकटिबन्धीय क्षेत्रों के अन्तर्गत एक सामान्य तौर पर प्रयोग में लायी जाने वाली प्रणाली है। हालांकि, मेड़ों पर खेती प्रणाली में एकीकरण के लिए सुबबूल के लिए प्रभावी विकल्प के तौर पर आक्रामक प्रकृति की प्रजातियों की पहचान में कई दिक्कतें भी उत्पन्न होती हैं।

स्ुबबूल के विकल्प की पहचान करने के लिए वर्ष 2014 से लगातार, आईसीएआर आरसीईआर, शोध केन्द्र, रांची द्वारा बहुत सारे किसानों के साथ मिलकर एक सहभागी अध्ययन किय गये हैं। कई जिलों जैसे- रांची, खूंटी व रामगढ़ में इन अध्ययनों को प्रयोग-कम-प्रदर्षन के तरीके से किसानों के खेतों पर भी सम्पन्न किया गया। निरीक्षणों के आधार पर, फलदार बगीचों में बायोमॉस के पोषण पुनचक्रीकरण के लिए भूमि सुधा की पहचान एक प्रभावी विकल्प के तौर पर की गयी है।

कुल्थी मूलतः भारत में हिमालयन क्षेत्र के उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र की फसल हैं। इसकी खेती प्राकृतिक रूप से होती है और पूरे दक्षिण-पूर्वी एषिया में विभिन्न उपयोगों के लिए इसकी खेती की जाती है। इसका औषधीय उपयोग भी है। अपने उच्च बायोमॉस उत्पादन, सघन वानस्पतिक आवरण, गहरी जड़ प्रणाली, गैर-आक्रामक प्रकृति के साथ ही नाइट्रोजन स्थिरीकरण क्षमता के कारण कृषि-वानिकी के लिए यह एक उचित प्रजाति है। बज्रदन्ती और कुल्थी कुछ ऐसी वनस्पतियां हैं, जिनका उपयोग अफ्रीकन देषों में पहले से ही उर्वरक के तौर पर किया जाता है। उसर भूमि को उर्वर बनाने तथा मृदा में कार्बनिक पदार्थों के स्तर में वृद्धि के साथ ही नाइट्रोजन, फासफोरस एवं पोटैषियम की मात्रा को बढ़ाने के लिए वृक्ष उपयोग होते हैं।

 

फलदार फसलों में पोषण पुनर्चक्रीकरण पर मॉडल
प्रयोग के पांच वर्षों में प्राप्त आंकड़ों के ऊपर काम करने के बाद, भारत के पूर्वी पठारी एवं पहाड़ी क्षेत्रों के लिए, बेल अथवा श्रीफल पर उत्पादन प्रणाली आधारित एक मॉडल विकसित किया गया। इस मॉडल का दृष्टिकोण वृक्षों की लाइनों के बीच भूमि सुधा पौधों को उगाकर उनसे बायोमॉस लेना था ताकि पोषण पुनर्चक्रीकरण के माध्यम से पौधों की जड़ों को समृद्ध किया जा सके।

इस मॉडल में, बेल के पौधों की रोपाई एक निष्चित दूरी पर की गयी। पौध से पौध के बीच की दूरी 2.5 मीटर तथा लाइन से लाइन के बीच की दूरी 5.0 मीटर रखी गयी। दो लाइनों के बीच 3.0 मीटर चौड़ी पट्टियों पर बीजों का अंकुरण कराकर भूमिसुधा के पौधे उगाये गये। भूमिसुधा के बीजों की बुवाई जुलाई में लाइन से की गयी और पौध से पौध की दूरी 15 सेमी0 तथा लाइन से लाइन की दूरी 30 सेमी0 रखी गयी। भूमि सुधा से एक वर्ष में दो बार टहनियों की कटाई-छंटाई की जा सकती है, जिसे बेल के पौधे की मल्चिंग के लिए उपयोग किया जा सकता है। भूमि सुधा और सुबबूल के बीच की गयी तुलना से प्रदर्षित होता है कि उपज और पोषण सामग्री की दृष्टि से भूमि सुधा सुबबूल से ज्यादा बेहतर है (देखें- तालिका नं0 1)।

उत्तक में प्राप्त पोषक तत्वों के आधार पर, भूमि सुधा के माध्यम से बेल की जड़ों के लिए पहले तीन वर्षों के पोषक तत्वों को पुनर्चक्रीकृत करते हुए प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 1.17 टन नाइट्रोजन, 0.06 टन फासफोरस एवं 0.42 टन पोटैषियम को पुनर्चक्रीकृत किया जा सकता है। जबकि सुबबूल से प्रति हेक्टेयर 0.41 टन नाइट्रोजन, 0.03 टन फासफोरस एवं 0.16 टन पोटैषियम को बायोमॉस के माध्यम से पुनर्चक्रीकृत किया जाता है। आर्थिक दृष्टि से देखा जाये तो प्रारम्भिक तीन वर्षों के दौरान प्रति हेक्टेयर क्रमषः रू0 23400.00, रू0 23600.00 एवं रू0 25200.00 के मूल्य के नाइट्रोजन, फासफोरस और पोटैषियम को भूमि सुधा के बायोमॉस के माध्यम से पुनर्चक्रीकरण किया गया।

तालिका 1: भूमि सुधा और सुबबूल के बीच तुलनात्मक अध्ययन

क्रमांकमानकभूमि सुधासुबबूल
1सूखा बायोमॉस उपज (टन/हेक्टेयर में)12.810.2
2पोषक तत्व (प्रतिषत में)
– नाइट्रोजन
2.942.94
फासफोरस0.240.24
पोटाष1.061.16
3सूक्ष्म पोषक तत्व (पीपीएम)
– जिंक
35.3539.97
कॉपर19.1814.07
मैग्नीषियम177.6079.54
आयरन203.20159.07

 

मल्चिंग के प्रभाव
बेल के पौधे की जड़ों में भूमि सुधा के बायोमॉस की मल्चिंग करने से मृदा में उपलब्ध पोटैषियम तत्वों एवं कार्बनिक कार्बन में उल्लेखनीय वृद्धि पायी गयी तथा तीन वर्षों के बाद मृदा की सघनता में कमी आयी अर्थात् मिट्टी का भुरभुरापन बढ़ गया। मिट्टी का कड़ापन खत्म होने से मृदा नमी तथा कार्बनिक तत्वों में वृद्धि हुई, जिससे पौधों की जड़ों को गहराई तक जाने में मदद मिली। इसी तरह खूंटी और रांची जिलों में शरपुंखी अथवा कुल्थी की पत्तियों एवं टहनियों की छंटाई कर उसकी मल्चिंग करने से आम के बगीचों को लाभान्वित किया गया। खूंटी जिले के टोरपा विकसखण्ड के गुप्हू गांव में रहने वाली बिमला देवी वर्ष 2014 में सबसे पहली अपनाने वाली महिला थीं। जबकि आज टोरपा विकासखण्ड एवं उसके निकटवर्ती विकासखण्ड मूरहू में एक स्वैच्छिक संगठन प्रदान के सहयोग से 20 से अधिक बगीचों में इस तकनीक का विस्तार हो गया है।

भूमि सुधा से उपजे बायोमॉस की मल्चिंग करने से पांच वर्ष पुराने बेल के पेड़ में भी पौध विकास के विभिन्न मानकों जैसे तना की मोटाई, पेड़ की ऊंचाई, छाया विस्तार एवं उपज में वृद्धि हुई है। आम के एक बागीचे में भूमि सुधा से प्राप्त बायोमॉस से आम्रपाली प्रजाति के पौधों की मल्चिंग लगातार दो वर्ष तक करने के परिणामस्वरूप पौधों की मजबूती बढ़कर 10 वर्ष पुराने आम के वृक्ष के बराबर हो सकती है। यद्यपि गांव वालों के पास प्रभावों को मापने की कोई विधि नहीं है और वे अनुभवों के आधार पर पत्तों पर पड़ने वाले प्रभावों को देखने के साथ ही फलों की उपज एवं गुणवत्ता के आधार पर इसका आकलन करते हैं। एक स्पष्ट प्रमाण यह हो सकता है कि पड़ोसी किसानों एवं आस-पास के क्षेत्रों से लोगों द्वारा भूमिसुधा के बीजों की निरन्तर मांग की जाती है। कोई आष्चर्यजनक बात नहीं है कि वे इसे स्थानीय स्तर पर एक ‘‘मेंड़ गाछ’’ अर्थात् ‘‘खाद पौधा’’ के रूप में जाना जाये। प्रदान ने इस पद्धति को विस्तारित करने का जो सरल तरीका अपनाया, उससे उम्मीद है कि इस क्षेत्र में यह तकनीक एक बड़े अभ्यास के तौर पर सामने आयेगी।

कोयला खनन प्रभावित क्षेत्रों में कुल्थी के माध्यम से भूमि सुधार
खनन के बाद बहुत बड़ा क्षेत्र बंजर छूट गया था, उसे पुनः बसाने और सुधार करने के लिए कहा गया। वानिकी एवं फलदार वृक्षों को रोपित किया गया और पेड़ों के बीच के स्थानों तथा मेड़ों पर कुल्थी के पौधों को लगाने हेतु किसानों को प्रोत्साहित किया गया। सबसे पहले वर्ष 2014 में रामगढ़ जिले के फुसरी गांव में श्री सुनील मुर्मू के एक हेक्टेयर खेत के चारों तरफ मेड़ों पर कुल्थी को लगाया गया। अब, अन्य दूसरे किसान इसे अपना रहे हैं और पेड़ों की दो लाइनों के बीच में भी इसे लगाया जा रहा है। वे इसे जानवरों एवं बकरियों के चारे के विकल्प के तौर पर भी उपयोग में ला रहे हैं।

निष्कर्ष
फलदार बगीचों में वृक्षों की दो लाइनों के बीच में भूमि सुधा जैसे बायोमॉस उत्पादित करने वाले पौधों का एकीकरण कर यह पाया गया कि फलदार पौधों के विकास एवं उपज को उन्नत बनाने के लिए यह एक प्रभावी तरीका है। हालांकि, आईसीएआर आरसीईआर, आर सी, रांची में किये गये अध्ययन यह संकेत देते हैं कि पांच वर्ष बाद भूमि सुधा के पौधे खत्म हो जाते हैं और प्रत्येक पांच वर्ष बाद इसे पुनः बुवाई करने की आवष्यकता होती है। इन पौधों के उन्मूलन हो जाने के बाद आवष्यकता पड़ने पर सुबबूल एक प्रभावी विकल्प है। आईसीएआर आरसीईआर, आर सी, रांची द्वारा किसानों के बीच वितरित करने हेतु भूमि सुधा के बीजों को उत्पादित किया जाता है और झारखण्ड में बड़ी संख्या में किसान भूमि सुधा को अपने बगीचों मे ंबो रहे हैं। प्रसार अभिकरणों के माध्यम से, समुचित एडवोकेसी करते हुए, फलदार बगीचे की उत्पादकता को उन्नत बनाने के लिए बड़े पैमाने पर इस पौधे का उपयोग किया जा सकता है।

प्रिया रंजन कुमार


प्रिया रंजन कुमार
पूर्वी क्षेत्र के लिए आईसीएआर रिसर्च काम्प्लेक्स
रांची, झारखण्ड - 834 010 (भारत)
ई-मेल: ourprk@gmail.com

Source: Recycling resources in agroecology farms, LEISA India, Vol, 21, No. 2, June 2019

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