डिजिटल तकनीक और प्राकृतिक संसाधनों से बालू में खेती संभव

Updated on June 5, 2021

विषेषकर नदी किनारे रहने वाले छोटी जोत के किसानों के लिए खेती करना बहुत कठिन हो जाता है, क्योंकि नदी में बाढ़ आने के कारण उसके रास्ते में आने वाले खेतों में बालू हो जाता है। ऐसी स्थिति में बिहार के बगहा क्षेत्र के किसानों ने विभिन्न मौसमी घटनाओं की पूर्व सूचना प्राप्त कर एवं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर बालू पर खेती करना संभव कर दिखाया है और उसी खेती से अच्छा लाभ कमा रहे हैं।


पृष्ठभूमि
बिहार राज्य के पष्चिमी चम्पारण जिले में पड़ने वाला बगहा उत्तर-पश्चिमी गंडक एवं नेपाल की पहाड़ी नदियों से घिरा हुआ ऐसा क्षेत्र है, जहां के लिए बाढ़ एक नियमित घटना है। साथ ही बाल्मिकी वन्य जीव अभ्यारण होने से इस क्षेत्र में वन्य जीव भी बहुतायत मात्रा में पाये जाते हैं। लगभग दो दषकों से मौसमों में त्वरित परिवर्तन होते रहने से जलवायु परिवर्तन जैसी वैष्विक समस्या का स्थानीय स्तर पर भी काफी दुष्प्रभाव देखने को मिल रहा है, जिसके कारण यहां के लोगों की आजीविका के मुख्य स्रोत खेती पर व्यापक दुष्प्रभाव पड़ा है। उनके लिए खेती निरन्तर एक घाटे का सौदा सिद्ध हो रही है। ऐसी स्थिति में लघु सीमांत कृषकों के लिए जीवन-यापन एक बड़ी चुनौती बनी रहती है। यहां का किसान विगत वर्ष की आपदा की क्षतिपूर्ति कर पाने से पहले ही पुनः आपदाग्रस्त हो जाता है। यह सिलसिला निरन्तर चलता रहता है और किसान प्रतिवर्ष लाचारी का जीवन जीने के लिए मजबूर होता है। बगहा, मधुबनी, पिपरासी, ठकराहां, भिटहा, योगापट्टी, रामनगर आदि पश्चिमी चम्पारण के ऐसे प्रखंड है जहां गन्ना मुख्य वार्षिक फसल है, रबी ऋतु में गेंहूं, सरसों एवं मसूर की खेती होती है, जबकि खरीफ ऋतु में मात्र 15-20 प्रतिषत क्षेत्रफल में धान की खेती भगवान भरोसे होती है क्योंकि यह पूरा क्षेत्र जल-जमाव प्रभावित हे। इस पूरे क्षेत्र में दो चीनी मिल के अतिरिक्त कोई अन्य कल कारखाना या उद्योग न होने के कारण इस क्षेत्र से रोजगार एवं आजीविका की तलाष में लोगों का पलायन भी बड़ी संख्या में होता है।

यह ध्यान देने योग्य है कि यहां पर छोटे मझोले सभी किसानों की जीविका का प्रमुख स्रोत गन्ना की खेती बन गई थी, जिसकी खेती करना एवं लागत लगाना तो किसानों के बस में रहता है, परंतु बिक्री एवं मूल्य निर्धारण और मूल्य का भुगतान मिल मालिकों के अधीन रहता है। मिल मालिक द्वारा इनके गन्ना की खरीद की जाती है, परन्तु उसका भुगतान काफी लम्बे समय बाद होने से इनकी आर्थिक व्यवस्था चरमरा जाती है। दूसरी बात यह भी कि मिल द्वारा सभी किसानों का गन्ना खरीदा भी नहीं जाता, ऐसी स्थिति में जिन किसानों का गन्ना मिल नहीं लेती, उसे वे निकटस्थ जनपद उत्तर प्रदेष के कुषीनगर के गुड़ बनाने वाले लोगों को औने-पौने दामों पर बेचने को बाध्य होते हैं।

इन विषम परिस्थितियों से गुजर रहे बगहा प्रखंड के रजवटिया गांव के किसानों के लिए जी0ई0ए0जी0, एल0डब्ल्यू0आर0 समर्थित अंतर सीमा बाढ़ उत्थानशील परियोजना एक वरदान से बढ़कर मददगार साबित हो रही है। इस परियोजना से जुड़कर किसान डिजिटल तकनीकों तथा प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करना सीख रहे हैं।

पहल
वर्ष 2018 में गोरखपुर एन्वायरनमेण्टल एक्षन ग्रुप ;जी0ई0ए0जी0द्ध ने एल0डब्ल्यू0आर0 के वित्तीय सहयोग से बगहा के रजवटिया गांव में काम करना प्रारम्भ किया। प्रारम्भ में गांव में समुदाय के साथ बैठक कर खेती-किसानी से सम्बन्धित समस्याओं को जानने के क्रम में निकलकर आया कि बाढ़ के कारण नदी के किनारे के खेतों में बालू जम जाता है, जिससे उस पर खेती करना संभव नहीं हो पाता और लोगों के सामने आजीविका का बड़ा संकट उत्पन्न हो जाता है। तब संस्था के विषेषज्ञ टीम ने गांव स्तर पर गठित संगठनों- स्वयं सहायता समूहों, किसान विद्यालयों, ग्राम संसाधन केन्द्रांे आदि के माध्यम से लोगों को संगठित करके उनके साथ खेती की नवीन विधाओं/तकनीकों पर काम करना प्रारम्भ किया। इन्हीं संगठनों से जुड़ी गांव की महिला किसान निषा देवी ने डिजिटल तकनीकी एवं प्राकृतिक संसाधनों के उत्थानषील अभ्यास को अपनाकर बालू में खेती करने में सफलता पाई है और अन्य किसानों के सामने एक सफल उदाहरण प्रस्तुत किया है।

सफलता, जो उदाहरण बनी
36 वर्षीय निषा देवी पत्नी बैरिस्टर बगहा के रजवटिया गांव में अपने पति, 3 बच्चों एवं ससुर के साथ रहती हैं। पैतृक सम्पत्ति के नाम पर इनके पास मात्रा आधा एकड़ खेती है, जिसमें से 0.4 एकड़ खेत गण्डक नदी के निकट बाढ़ एवं जल-जमाव वाले क्षेत्र में स्थित है। वर्ष में 6 माह तक खेत का अधिकतम क्षेत्रफल डूबा होने के कारण परिवार की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है और बैरिस्टर अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए आजीविका की तलाष में दिल्ली चले जाते हैं। पीछे निषा अपने बूढ़े ससुर और 3 बच्चों के साथ बांध के निकट झोपड़ी बनाकर रहती हैं। इनका अपना पैतृक घर भी 2008 की बाढ़ की भेंट चढ़ गया है।

मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी के कारण जब पूरा विष्व प्रभावित था, वह समय निषा देवी के परिवार के लिए काफी कठिन सिद्ध हुआ। जून माह में बाढ़ के कारण पूरी खेती प्रभावित हो गयी तो कोरोना महामारी के कारण लॉकडाउन लगा और पति की भी घर वापसी हो गयी। उस समय इनके सामने अपना व अपने परिवार का पेट-परदा चलाना बहुत बड़ी चुनौती हो गयी। इसी समय निषा देवी ने अंतर सीमा बाढ़ उत्थानषील परियोजना के अन्तर्गत प्राप्त जानकारियों का उपयोग अपने बालू वाली खेती को करने में किया।

इन्हांेने बटाई पर एक एकड़ खेत लिया और परियोजना कार्यकर्ता द्वारा सुझाये स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग, मौसम सम्बन्धी पूर्वानुमान एवं सलाह के साथ-साथ उत्थानषील अभ्यासों को अपनाया और खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों से निपटने में सफलता पाई। निषा ने मौसम सम्बन्धी प्राप्त सूचनाओं के आधार पर अपने खेत में बुवाई नहीं की, क्योंकि एक तो वहां जल-जमाव था, दूसरे इस बार बाढ़ एवं अधिक बारिष के पूर्वानुमान के कारण खरीफ में धान की रोपाई भी नहीं हो पाई। तब इन्होंने परियोजना कार्यकर्ताओं से मषरूम की खेती के बारे में जानकारी प्राप्त की और सितम्बर, 2020 में ओयस्टर मषरूम की बुवाई की। शुरूआत में इन्होंने 18 बैग में मषरूम लगाया, जिसमें उनकी कुल लागत रू0 1250.00 आयी। 40 दिनों बाद 27 अक्टूबर को मषरूम की पहली खेप निकली, जिसका कुल वजन 7 किग्रा0 था और जिसे इन्होंने रू0 120.00 प्रति किग्रा0 की दर से बेचकर रू0 840.00 की आय प्राप्त की। इसके बाद प्रत्येक तीन-चार दिनों पर मषरूम निकलने लगा और दिसम्बर माह तक कुल 45 किग्रा0 मषरूम की उपज हुई। 30 किग्रा0 मषरूम को इन्होंने रू0 150.00 प्रति किग्रा0 की दर से बेच कर रू0 4500.00 प्राप्त किया और 15 किग्रा0 स्वयं अपने उपभोग में तथा आस-पड़ोस एवं नाते-रिष्तेदार को देने में व्यय किया। इस प्रकार इन्होंने कुल 52 किग्रा0 मषरूम की उपज प्राप्त की तथा स्वयं के उपभोग के बाद रू0 5340.00 की आमदनी प्राप्त की, जिसमें से लागत का रू0 1250.00 घटाने के बाद रू0 4090.00 की शुद्ध आमदनी मात्र तीन माह में प्राप्त करने के बाद निषा के अन्दर आत्मविष्वास का संचार हुआ है। अब निषा ने रबी ऋतु में अपने 0.30 एकड़ में लहसुन की दो कतारों के बीच मेथी लगायी तथा खेत के मेड़ पर मूली की खेती की। इन्होंने उपरोक्त क्षेत्रफल से 7.5 कुन्तल लहसुन, 3.8 कुन्तल मेथी एवं 60 किग्रा0 मूली की उपज प्राप्त की, जिससे इन्हें क्रमषः रू0 6000.00, रू0 3480.00 एवं 800.00 अर्थात् कुल रू0 10280.00 की आय हुई। जबकि लहसुन, मेथी एवं मूली की खेती में लागत सिर्फ रू0 1980.00 आयी, क्योंकि खाद एवं कीटनाषक घर के थे और सिंचाई वर्षा आधारित हो गयी मात्र बीज का दाम लगा।

इनका कहना है कि, ‘‘खेती में हमने मौसम पूर्वानुमान सन्देष में प्राप्त जानकारियों का उपयोग किया। बारिष की सूचना मिली तो उसका उपयोग सिंचाई के तौर पर किया, बारिष होने की जानकारी पूर्व में ही मिल जाने पर फसलों की कटाई एवं खुदाई थोड़ा पहले ही कर हमने अपनी फसल को नुकसान होने से बचा लिया। इसके साथ ही हमने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों जैसे- गोबर, गाय का मूत्र, लहसुन, सुर्ती की गांठ, अण्डा का छिलका, सब्ज़ियों का छिलका आदि से मटका खाद, मटका कीटनाषक, वर्मी कम्पोस्ट आदि तैयार किया और उसका उपयोग कर रसायनिक उर्वरक एवं कीटनाषक आदि पर होने वाले खर्च को कम किया।’’ आगे इनका कहना है कि – ‘‘लहसुन वाले खेत में हमने मक्का, नेनुआ और भिण्डी को दो-दो मीटर की दूरी पर कतार में लगा दिया है, जिसमें मक्का की मात्र बाली को भुट्टा के रूप में बेचकर 4200 भुट्टे से रू0 12600.00 की आमदनी हुई और 15 मई तक नेनुआ की 1.10 कुन्तल तथा भिण्डी की 1.50 कुन्तल उपज प्राप्त हुई, जिसे बाजार में बेचकर रू0 7800.00 की आमदनी हुई है। नेनुआ और भिण्डी से अभी जून तक उपज प्राप्त होती रहेगी।’’

परिणाम
निषा कहती हैं, ‘‘इस सफलता को देखकर हमें हमारे पति एवं पूरे परिवार का सहयोग मिलने लगा, जिससे उत्साहित होकर हमने दिसम्बर माह में एक एकड़ खेत बटाई पर लिया। यह खेत नदी किनारे तट पर स्थित बलुई जमीन वाला खेत था। हमने इस जमीन पर एक इंच गहरा और 12 इंच व्यास के गढ्ढे खोदकर उसमें घर पर तैयार कम्पोस्ट को डालकर लाइन से लाइन दो मीटर की दूरी अपनाते हुए आधे खेत में तरबूज एवं आधे खेत में लौकी एवं नेनुआ की बुवाई कर दी।’’ जमीन पर नमी बनाये रखने के लिए तरबूज की डालियों को काटकर 1/2 इंच मोटी परत पूरे खेत में फैला दिया। इससे इनकी सिंचाई की लागत में कमी आयी साथ ही निराई-गुड़ाई का श्रम भी बच गया, क्योंकि मल्चिंग करने से खेत में खर-पतवार नहीं जमा। दूसरा फायदा यह भी हुआ कि जो फल निकला वह सीधे मिट्टी, बालू के सम्पर्क में न आने से उसमें सड़न नहीं हुआ। संस्था से प्राप्त मौसम सम्बन्धी जानकारी का उपयोग कर इन्होंने सिंचाई में लगने वाले लागत में कमी की और फलों की तुड़ाई पहले ही कर लेने से बारिष से होने वाले नुकसान को कम किया। निषा देवी का कहना है कि इस लॉकडाउन में हमने अपने इस बटाई के खेत से उपजे तरबूज, लौकी एवं नेनुआ को बेचकर रू0 28500.00 की आमदनी प्राप्त की है।
इस डिजिटल मौसम पूर्वानुमान तथा बिना किसी से मिले ई-लर्निंग प्रषिक्षण के माध्यम से प्राप्त हो रहे तकनीकी एवं सुरक्षात्मक ज्ञान एवं जानकारियों ने निषा जैसे किसानों की तकदीर ही बदल दी है। रजवटिया गांव के छोटे, मझोले किसानों के लिए उनका गांव ही अब दिल्ली, बम्बई बन गया है। निषा देवी को देखकर गांव एवं आस-पास के अन्य गांवों के दर्जनों किसानों ने उनकी इस विधा को अपनाया है और सफलता प्राप्त कर रहे हैं। वे निषा देवी के खेत पर आकर उनसे जानकारी प्राप्त करते हैं, जिससे उनके आत्मसम्मान में वृद्धि हुई है। संस्था कार्यकर्ताओं का यह छोटा सा प्रयास इस दुरूह क्षेत्र के लिए आषा की एक किरण के समान है, जिसका लाभ उठाकर निषा देवी जैसे बहुत से किसान लाभान्वित हो रहे हैं।

रवि प्रकाष मिश्रा एवं अर्चना श्रीवास्तव


अर्चना श्रीवास्तव
प्रोग्राम प्रोफेशनल्स
गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्शन ग्रुप
224, पुर्दिलपुर, एम0जी0 कालेज रोड
गोरखपुर - 273 001, उत्तर प्रदेश, भारत

 

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