जैसा कि हम सभी देख रहे हैं कि पूरा विष्व कोरोना वायरस जैसी महामारी से जूझ रहा है। बीमारी के सम्पर्क में आने के कारण होने वाले प्रत्यक्ष प्रभावों के अलावा भी राष्ट््रों को अन्य बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कोरोना महामारी से बचाव हेतु लगाये जाने वाले लम्बे व पूर्णतया लॉकडाउन के कारण बड़े पैमाने पर आजीविका का ह्रास, बेरोजगारी, भूख एवं लोगों के समग्र स्वास्थ्य में गिरावट जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
यद्यपि सरकार द्वारा किसानों की सुरक्षा के लिए कुछ उपायों की घोषणा की गयी थी, लेकिन फिर भी लॉकडाउन का कृषि अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ा है और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान आने से पूरे देष के किसानों पर गहरा प्रभाव पड़ा है और विषेषकर छोटे-मझोले किसानों को अधिकतम कठिनाई झेलने के लिए बाध्य होना पड़ा है। मजदूरों की कमी, परिवहन का अभाव तथा सीमित बाजार कार्यों सहित अनेक कारणों के चलते किसान अपने फसलों की कटाई एवं उनके विपणन हेतु संघर्ष कर रहे हैं।
इसके अलावा बहुत सी ऐसी दूसरी चुनौतियां भी हैं, जिन्हें हम कोविड-19 जैसी महामारी के कारण भूल से गये हैं। इनमें भविष्य में खाद्य आपूर्ति हेतु खतरा उत्पन्न करने वाली चरम मौसमी घटनाएं, जल का संकट, मृदा का अपक्षरण आदि चुनौतियां हैं। इन पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने तथा खाद्य प्रणालियों को ‘‘कैलोरी समृद्ध’’ से ‘‘पोषण समृद्ध’’ की ओर बदलने में विविधीकृत कृषिगत उत्पादन से मदद मिल सकती है। स्थाई खाद्य मूल्य श्रृंखला विकसित करने से खाद्य प्रणाली में बदलाव आ सकता है।
जब लॉकडाउन में हम केवल ताजे और पोषणयुक्त भोजन कैसे प्राप्त करें, सिर्फ इसी बारे में सोचते हैं। समग्र खाद्य से दूर होकर वसायुक्त बर्गर और पास्ता तक का एक लम्बा रास्ता हमने तय किया है। एक समय था जब हम अपने घर के पीछे की खाली जमीन में उगाया गया भोजन करते थे और केरला में अभी भी बहुत सी गृहवाटिका हैं। इन दिनों स्थानीय का विचार लोगों के लिए काफी नवीन है और आधुनिकता के रैपर में लिपटी प्रत्येक स्थानीय वस्तु सुपर बाजार में उपलब्ध है।
पोषण वाटिकाओं को प्रोत्साहित करने के लिए देष भर में बहुत से अभियान हैं और इसमें सभी स्थानीय सब्ज़ियों को शामिल करने की आवष्यकता है क्योंकि वे निष्चित तौर पर पोषण और स्वास्थ्य, समुदाय, संस्कृति एवं पारिस्थितिकी में सुधार करते हैं।
उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ सरकार ने इसके महत्व को पहचानते हुए बाड़ी विकास को अपने कार्यक्रम का एक प्रमुख बिन्दु बना दिया है जिसे एनजीजीबी ;नरवा गारू- एक घुरूवा बाड़ीद्ध कहा जाता है और इस दिषा में कार्य प्रारम्भ करते हुए बाड़ी विकास के लिए दिषा-निर्देष जारी किये गये हैं। इन गृहवाटिकाओं को विकसित करने के लिए सरकार द्वारा प्रोत्साहन राषि दिया जाना चाहिए, जिससे वास्तव में मौसम और महामारी के इस चुनौतीपूर्ण समय में खाद्य सुरक्षा एवं पोषण की दिषा में बदलाव लाया जा सकता है।
अर्पण भट्टाचार्य एवं अजय गुप्ता द्वारा लिखित और एग्रीकल्चर वर्ल्ड के जून, 2020 में प्रकाषित प्रदान संस्था के एक रिपोर्ट के अनुसार बस्तर, छत्तीसगढ़ में रहने वाले एक सीमान्त किसान सोमी बघेल की कहानी काफी प्रेरणादायक है, जब उन्होंने अपनी बाड़ी को विकसित करने का निष्चय किया और बाड़ी विकसित करने तथा खेती की नवीनतम तकनीकों को सीखने हेतु उन्हें नाबार्ड, जिला उद्यान विभाग, मनरेगा एवं प्रदान द्वारा संचालित बहुत से कार्यक्रमों के अन्तर्गत सहयोग मिलना प्रारम्भ हो गया ताकि वे इसका लाभ लेकर अच्छी आय अर्जित कर सकें।
इससे उन्हें खेती के बदले तरीके जैसे अपनी बाड़ी में पोषण वाटिका उगाने में सहभागिता करने हेतु एक मंच मिला। सामान्यतः सभी आदिवासी घरों में बाड़ी पाया जाता है, जिसमें मक्का, मोटे अनाज एवं पौष्टिक स्थानीय सब्ज़ियां जैसे- पपीता, मोरिंगा, कुछ बारहमासी बेलें जैसे- कुन्दरू, पेठा एवं हरी पत्तेदार प्रजातियां लगायी जाती हैं। ये सभी आय अर्जन करने वाली होती हैं और आवष्यकता पड़ने पर खाद्य सामग्री के तौर पर भी उपयोग में आती हैं। ग्रामीण आदिवासी किसानों, विषेषकर महिलाओं के लिए बाड़ी एक अमूल्य संसाधन है। गृहवाटिकाओं एवं ग्रामीण परिवारों के बेहतर जीवन में इनकी बहुमुखी भूमिका को रेखांकित करने वाले बहुत से शोध भी इस तर्क को सही ठहराते हैं। कोविड के बाद के परिदृष्य में खाद्य सुरक्षा हेतु अपने बाड़ी को विकसित करने वाले कुछ कार्यक्रमों में पंजीकरण कराने वाली महिलाओं की संख्या में वृद्धि देखी गयी है।
स्थानीय खाद्य के लिए लोकलिसियस एक जन आन्दोलन है और इसकी शुरूआत पाण्डिचेरी के सोलिट्यूट कैफे, औउरोविले के रहने वाले कृष्णा मैकेनज़ाई द्वारा की गयी है। और सभी स्थानीय खाद्य पदार्थ कठोर होते हैं और बहुतायत में उगते हैं। इन्हें बहुत कम देख-भाल की आवष्यकता होती है और कम पानी में भी उग जाते हैं। इन्हें आसानी से उगाया जाता है, ये पोषण से भरपूर होते हैं और आर्थिक रूप से सभी की पहुंच में होते हैं। यदि पूरा समुदाय सप्ताह में कुछ समय तक खाता है तो पोषक पालक, रतालू अथवा हरा पपीता की विषाल विविधता को प्राप्त किया जा सकता है। यदि हम धरती माता और अपनी पोषण जरूरतों के सम्बन्ध को पुनः जीवित कर सकें तो हमारी चेतना में यह एक बड़ा परिवर्तन होगा। कोविड महामारी के बाद के परिदृष्य में सामुदायिक सब्जी की टोकरियों के लिए हस्ताक्षर करने वाले लोगों की संख्या में काफी वृद्धि देखी गयी।
गुजरात का एक स्वैच्छिक संगठन उत्थान समुदायों के बीच काम करते हुए निरन्तर लोगों के सम्पर्क में था और उसने देखा था कि कोविड के दौरान बहुत से गांवों में सब्ज़ियां तथा गुणवत्तापूर्ण बीज आसानी से नहीं पहुंच पा रहे हैं। पैसों की तंगी के कारण अधिकांष परिवार सब्जी नहीं खरीद पायेंगे। सबसे ज्यादा पीड़ित महिलाएं एवं बच्चे होंगे, क्योंकि पितृसत्तात्मक प्रथाओं के कारण परिवार में पुरूषों को प्राथमिकता दी जायेगी। बहुत से भूमिहीन परिवारों के पास सब्जी उगाने का भी कोई विकल्प नहीं है।
53 गांवों में 2514 परिवारों को गृहवाटिका किट उपलब्ध कराये गये। तटीय क्षेत्रों के 864 परिवारों तथा आदिवासी क्षेत्रों के 1650 परिवारों को 6 प्रजाति के बीज उपलब्ध कराये गये। जैव उर्वरकों की आवष्यकता का ध्यान सामूहिक रूप से रखा गया और यह कार्य महिला समूहों तथा स्थाई कृषि महिला प्रषिक्षकों द्वारा किया गया। यह गृहवाटिका किट निर्दिष्ट भूमि अथवा लोगों के घरों के आस-पास की 1000-1500 वर्गफीट भूमि के लिए उपयुक्त थी। भिण्डी, ग्वारफली, लोबिया, लौकी, करेला, नेनुआ, तरोई के स्थानीय स्तर पर शोध किये गये तथा ट््रूथफुल बीजों को वितरित किया गया। वितरण के दौरान उत्थान द्वारा विकसित सुरक्षा मानकों का पूरा-पूरा ध्यान रखा गया, जिसके अन्तर्गत यह सुनिष्चित किया गया कि संस्था के कार्यकर्ता एवं गांव स्तरीय स्वयंसेवक मास्क एवं दस्ताने पहने हों। अच्छे परिणाम प्राप्त होने से पंचायत और गांव के नेता भी साथ में जुड़ गये। पूरक गतिविधियों के तौर पर पम्पलेट, ‘‘स्थाई कृषि अभ्यासों’’ में महिला प्रषिक्षकों द्वारा जैव कीटनाषक उत्पादन एवं अन्य अभ्यासों के पैकेज पर वीडियो आदि के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाया गया।
इस संकट के समय जिन 2514 परिवारों की मदद की गयी थी, उन्होंने आगे बढ़कर 7500 ऐसे परिवारों की मदद की, जो भूमिहीन थे और भूमि तथा जल संसाधनों के अभाव में सब्ज़ियां उगाने में सक्षम नहीं थे। एक अनुमान के मुताबिक मध्य जुलाई से सितम्बर, 2020 के बीच ढाई महीने तक 7500 परिवारों को 700 ग्राम प्रतिदिन प्रति परिवार सब्ज़ियों की आपूर्ति कर उनके पोषण सुरक्षा में सहायता दी गयी। यह मात्रा औसतन 6 सदस्यों वाले परिवार के लिए पर्याप्त थी।
इस तरह के और भी अभियान चलाये जाने की आवष्यकता है ताकि हम पोषण वाटिकाओं के माध्यम से विविधीकृत खाद्य सामग्रियों को उगाते हुए पोषण की महत्ता को समझ सकें। इस चुनौतीपूर्ण समय में महिलाओं और बच्चों के बेहतरी पर सबसे अधिक ध्यान देने की आवष्यकता है और स्थानीय सब्ज़ियों के अलावा आयातित कोई भी फल या सब्जी उन्हें प्रतिरोधक क्षमता नहीं प्रदान कर सकती। निष्चित तौर पर समान विचारधारा वाले किसानों की आवष्यकता है, जो अपनी सांस्कृतिक खेती विरासत के मूल्य को पहचान कर उसे संभालने को तैयार हों तथा वित्तीय दृष्टि से सक्षम समुदाय की खोज एवं निर्माण में मदद करें।
लक्ष्मी उन्नीथन
लक्ष्मी उन्नीथन
सम्पादक- एग्रीकल्चर वर्ल्ड
प्रमुख जन सम्पर्क एवं संचार
कृषि जागरण, डीएसआर एग्री मीडिया प्राइवेट लिमिटेड
60/9, तीसरा फ्लोर, यूसुफ सराय मार्केट
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ई-मेल: sdr.lakshmi@krishijagran.com
Source: Agroecology and going local, LEISA India, Vol.22, No.4, December 2020



