आज तकनीकों पर हमारी निर्भरता पहले से कहीं ज्यादा हो गयी है। डिजिटल तकनीकों की ओर इस बदलाव से हमारी खाद्य सुरक्षा सुनिष्चित करने वाले छोटे, सीमान्त खेतिहर समुदायों को वंचित नहीं रखा जाना चाहिए। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्षन ग्रुप ने 1200 लघु किसानों को इस तरह से सषक्त किया है कि वे इन डिजिटल तकनीकों का उपयोग करते हुए मौसमी उतार-चढ़ावों को झेलकर खेती में बेहतर प्रदर्षन कर रहे हैं।
आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिषा में मौसमी उतार-चढ़ावों के बीच खेती में लचीलापन अथवा अनुकूलन क्षमता विकसित करना एक बड़ी चुनौती है। व्यापक बाढ़ एवं जल-जमाव के कारण पूर्वी उत्तर प्रदेष और उत्तरी बिहार के लाखों लघु एवं सीमान्त किसान बेघर एवं भूमिहीन हो गये हैं। जलवायु परिवर्तन, बाढ़ की प्रकृति एवं प्रवृत्ति, अतिवृष्टि की घटनाएं, एक वर्षा से दूसरी वर्षा के बीच लम्बा अन्तराल एवं सूखा, बाढ़ के बाद सूखा, कीटों का आक्रमण एवं फसलों पर लगने वाली नयी-नयी बीमारियों ने इस क्षेत्र को विषिष्ट बना दिया है। किसानों के एक बड़े समुदाय को अनुदान, राहत एवं मुआवजा के दया पर निर्भर रहने के लिए प्रेरित किया गया है।
जलवायु अनिष्चितताओं तथा कृषि पर इसके प्रभावों को समझते हुए, यह आवष्यक हो जाता है कि कृषि एडवाइजरी एवं व्यवहारिक समाधान के साथ बड़ी संख्या में प्रभावित लोगों तक अपनी पहुँच बनायी जाये। हालांकि, बाढ़ की स्थितियों के अन्तर्गत पारम्परिक माध्यमों का उपयोग करते हुए किसानों तक पहुँच सुनिष्चित करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसलिए ऐसी कुछ परिस्थितियों में, डिजिटल तकनीक संचार का एक पसंदीदा माध्यम बन जाता है।
परियोजना अन्तर्गत आच्छादित गाँवों के अधिकांष किसानों के पास आज मोबाइल फोन है और इस तरह वे बिना इण्टरनेट के भी साधारण लिखा हुआ या वॉयस सन्देष प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए, डिजिटल स्मार्ट फोन तकनीक के माध्यम से मौसम एवं जलवायु सूचनाओं तक किसानों की पहुँच होने से किसान लाभान्वित होंगे और तनावपूर्ण स्थितियों के दौरान उचित निर्णय लेने हेतु सक्षम होंगे। यह निष्चित रूप से सम्बन्धित जोखिमों को कम करने, विकल्पों को बढ़ाने, सीमित संसाधनों के प्रभावी उपयोग को उन्नत करने, लागत को कम करने और फसल तथा पशुधन की उत्पादन एवं उत्पादकता को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
पहल
वर्ष 2018 में, गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्षन ग्रुप (जी0ई0ए0जी0) ने भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से जलवायु अनुकूलित तकनीकों को अपनाते हुए गोरखपुर एवं पष्चिमी चम्पारण के 10000 लघु एवं सीमान्त किसानों को सषक्त करने हेतु एक कार्यक्रम का प्रारम्भ किया। जलवायु अनुकूलन के लिए तकनीकों में बाढ़ अनुकूलित कृषि तकनीक, छोटी जोत हेतु कृषि मषीनीकरण, प्रभावी सिंचाई प्रणाली का विकास, जैव-उर्वरकों को अपनाते हुए मृदा में पोषण बढ़ाना एवं कृषि पद्धतियों में डिजिटल तकनीकों को बढ़ावा देना शामिल है।
जी0ई0ए0जी0 ने दो ऑटोमेटिक वेदर स्टेषनों (ए0डब्ल्यू0एस0) की स्थापना की। एक गोरखपुर के कैम्पियरगंज विकास के मोहनाग गाँव में तथा दूसरा पष्चिमी चम्पारण के नौतन प्रखण्ड के जमुनिया गाँव में लगाया गया है। इसके साथ ही लोहरपुरवा, धर्मपुर (कैम्पियरगंज विकास खण्ड), पचगांवा तथा जिन्दापुर (जंगल कौड़िया विकास खण्ड), गोरखपुर तथा बैकुण्ठवा (नौतन प्रखण्ड) पष्चिमी चम्पारण में पांच रेनगेज मषीनें भी लगायी गयीं। ए0डब्ल्यू0एस0 एवं रेनगेज के माध्यम से आँकड़ों का संग्रह एवं मौसम पूर्वानुमान तैयार करने का कार्य तीन प्रक्रियाआंे के माध्यम से पूरा किया जाता है- 1) आँकड़ा प्रसंस्करण, 2) गुणवत्ता नियंत्रण एवं 3) उद्देष्य विष्लेषण।
प्रासंगिक मौसम सम्बन्धी आँकड़ों का लाभ लेते हुए क्षेत्र की सूक्ष्म जलवायु विज्ञान को समझने में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के स्थानीय कार्यालय द्वारा जी0ई0ए0जी0 की मदद की जाती है। प्रारम्भ में, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग द्वारा सूक्ष्मस्तरीय मौसम पूर्वानुमान से सम्बन्धित सूचना तथा विभाग द्वारा तैयार किये गये पूर्वानुमान मॉडल को एकत्रित किया गया। गणितीय मॉडलिंग पद्धति का इस्तेमाल करते हुए इन सूक्ष्मस्तरीय आँकड़ों को विकासखण्ड स्तर पर डाउनस्केल किया गया और फिर कार्यान्वयन क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर स्थापित ए0डब्ल्यू0एस तथा रेनगेज मषीनों से प्राप्त आँकड़ों से उसका मिलान किया गया। मौसम सम्बन्धी एडवायजरी को अन्तिम रूप प्रदान करने से पहले, पूर्वानुमान की प्रभाविता को उन्नत बनाने की दृष्टि से स्थानीय स्थितियों के अनुरूप समस्याओं एवं उनके समाधान के ऊपर जी0ई0ए0जी0 के विषय विषेषज्ञ के साथ व्यापक विचार-विमर्ष करते हैं।
जी0ई0ए0जी0 ने ग्रामीण क्षेत्रों मंे उपलब्ध डिजिटल स्मार्टफोन तकनीकों का लाभ उठाते हुए लघु एवं सीमान्त किसानों के दरवाजे तक मौसम एवं कृषि सम्बन्धित एडवायजरी पहुँचाना प्रारम्भ किया। स्थानीय मौसम विज्ञान विभाग के कार्यालय एवं नरेन्द्र देव कृषि विष्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या (उत्तर प्रदेष) के सहयोग से जी0ई0ए0जी0 ने मौसम आधारित सूचनाओं, रडार और सेटेलाइट आधारित रिमोट सेसिंग डाटा की मात्रा का निर्धारण, सूचकांकों को बनाने एवं फसल विकास के विभिन्न चरणों पर कृषिगत कार्यों में रणनीतिक निर्णय लेने के लिए किसानों को संचालन सम्बन्धी सेवाएं प्रदान करने हेतु विस्तृत निरीक्षण करता है।
| उत्तर प्रदेष के गोरखपुर जिले में जंगल कौड़िया विकास खण्ड के भुईंधरपुर के युवा मॉडल किसान दुर्गेष कनौजिया कहते हैं, ‘‘मैं फसल के विकास एवं कीटों के आक्रमण की घटनाओं अथवा अनियमित मौसम के कारण फसल नुकसान को देखने के लिए अपने खेत में प्रतिदिन काम करता हूं। मैं अपने स्मार्टफोन के माध्यम से अपनी समस्याओं/प्रष्नों को जी0ई0ए0जी0 के विषेषज्ञ से पूछता हूं, जिसका वे कुछ मिनटों में ही समाधान/उत्तर दे देते हैं।’’ |
सामग्री और प्रसार
कृषि एडवायजरी के लिए, जी0ई0ए0जी0 के अन्दर कार्यरत मौसम वैज्ञानिक ने एक जलवायु-स्मार्ट एडवायजरी मॉडल विकसित किया, जो सभी प्रमुख फसलों के लिए मौसमवार फसल प्रारूप को दर्षाता है। मॉडल राज्य शोध संस्थानों के कृषि विषेषज्ञों से वास्तविक समय में तकनीकी निवेषों पर भी विचार करता है। इसके बाद, मूल्य संवर्धन करते हुए विषेषकर पारिस्थितिकी सिद्धान्तों पर आधारित कम बाहरी लागत कृषि को बढ़ावा देने पर जोर देने के साथ फसल एडवायजरी भी दी जाती है। सूचनाओं के दोनों सेटों को मिलाते हुए जी0ई0ए0जी0 स्थानीय हिन्दी भाषा में किसानों को मौसम आधारित कृषि एडवायजरी जारी करती है, जिसमें स्थाई कृषि अभ्यासों को बढ़ावा देने वाले पूर्वानुमान एवं उपचारात्मक उपायों को शामिल किया जाता है।
डिजिटल स्मार्ट फोन आधारित पहल के माध्यम से, किसानों को मौसम की स्थितियों की पूर्व सूचना जैसे- वर्षा की संभावना (हल्की या भारी), तापमान (अधिकतम तापमान, न्यूनतम तापमान एवं पूर्ण तापमान में भिन्नता), अधिकतम और न्यूनतम सापेक्ष आर्द्रता, बादल की स्थितियों एवं हवा की दिषा एवं गति की सूचना प्रत्येक 5 दिन पर दी जाती है। इसी मौसम आधारित सूचना में, सामान्य तौर पर किसानों को खरीफ, रबी एवं जायद ऋतु में बुवाई के उचित समय, सिंचाई का समय, खेत में उर्वरकों एवं कीटनाषकों के उपयोग, वर्षा की संभावना के आधार पर कटाई एवं पालतू जानवरों के टीकाकरण से सम्बन्धित सूचना भी दी जाती है। इन सूचनाओं के आधार पर किसान वर्षा की घटनाओं के आधार पर प्रमुख फसलों की पूर्व अथवा बाद में बुवाई, उसकी प्रजाति/नस्ल/पौध के लिए पहले से ही सतर्क हो जाते हैं। इसके साथ ही ऋतु विषेष की फसलों/सब्ज़ियों में पौध विकास के विभिन्न चरणों में संभावित बीमारियों एवं उनके उपचारात्मक उपायों तथा पालतू जानवरों के स्वास्थ्य देख-भाल से सम्बन्धित सूचनाएं भी प्रदान की जाती हैं।
हमारे वेब आधारित प्लेटफार्म जैसे छोटे लिखित संदेषों के माध्यम से प्रत्येक माह में 5 दिन के अन्तराल पर कुल 6 सूचनाएं सीधे किसानों को तथा डी0एस0टी0 फील्ड कार्यकर्त्ताओं के मोबाइल पर नियमित रूप से प्रसारित की जाती हैं। अधिक से अधिक किसानों तक अपनी पहुँच बनाने के लिए, डी0एस0टी0 फील्ड कार्यकर्त्ता प्रत्येक कृषि सेवा केन्द्र के बाहर डिस्पले बोर्ड पर इन सूचनाओं को लिख देते हैं ताकि केन्द्र पर आने वाले प्रत्येक किसान को इसकी जानकारी हो सके।
यह पहल किसानों को खेती सम्बन्धी विभिन्न गतिविधियों को करने के लिए पूर्व में सूचित कर देती है। इसका सबसे बड़ा फायदा तो यह है कि परियोजना आच्छादित क्षेत्र में मौसम की संभावित स्थितियों एवं व्यवहारिक कृषि एडवायजरी सम्बन्धी सूचनाएं मिलने से प्रक्षेत्र स्तर पर त्वरित निर्णय लेने हेतु किसानों को दिषा-निर्देष मिलता है। इसके अतिरिक्त, इस पहल से किसानों को फसल का नुकसान कम करने, कृषि निवेष की लागत घटाने एवं अपनी आजीविका प्रणाली के लचीलेपन को उन्नत बनाने में भी काफी सहायता मिली है।
औसतन, प्रतिदिन दो से तीन फोन अथवा दो एडवायजरी के बीच 10-12 किसानों के फोन अथवा मिस्ड कॉल प्राप्त किये जाते हैं। कभी-कभी किसान जी0ई0ए0जी0 द्वारा बनाये गये किसानों के व्हाट्स ग्रुप पर अपनी समस्याओं को लिख कर अथवा फोटो के माध्यम से अपने मोबाइल से भेजते हैं। वे हमेषा मौसम/चरम मौसमी चेतावनी एवं फसल/पषुपालन पर एडवायजरी से सम्बन्धित अतिरिक्त सूचनाएं जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। जी0ई0ए0जी0 के विषेषज्ञ प्रत्येक किसान के प्रष्न पर तुरन्त उत्तर देते हैं। एडवायजरी के अपनाने के स्तर, उसकी प्रासंगिकता एवं नयी तकनीकों को अपनाने के परिणामों को जानने के लिए जी0ई0ए0जी0 किसानों से नियमित रूप से फीड बैक भी लेती रहती है।
प्रभाव
अब तक, गोरखपुर और पष्चिमी चम्पारण के 18 गाँवों के 1200 लघु एवं सीमान्त किसानों को इस डिजिटल सेवा के माध्यम से सीधे जोड़ा गया है और खरीफ एवं रबी ऋतुओं में प्रमुख फसलों के लिए इसे ट्रैक किया गया है। दोनों राज्यों के 36 मॉडल किसानों को फसल एडवायजरी, मौसम एडवायजरी, जियो-टैगिंग एवं फसल स्वास्थ्य निगरानी के ऊपर जी0ई0ए0जी0 द्वारा व्यवस्थित तरीके से प्रषिक्षित किया गया है। ये मॉडल किसान बिहार और उत्तर प्रदेष में डिजिटल हस्तक्षेपों को बढ़ाने के लिए ‘‘परिवर्तन एजेण्ट’’ के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
| प्रभावी निर्णय लेने के लिए एडवायजरी गोरखपुर के राखूखोर गाँव के 48 वर्षीय मॉडल किसान रामनिवास का कहना है, ‘‘फसल एवं प्रक्षेत्र नियोजन करने में प्रभावी निर्णय लेने हेतु मौसम सम्बन्धित सूचनाएं हमें बहुत मदद करती हैं।’’ पिछले दो वर्षों में गोरखपुर में कम बारिष हो रही है। इस कारण किसानों ने खरीफ ऋतु में मूंगफली की खेती की। क्षेत्र के किसानों ने इस वर्ष भी इसी अभ्यास को अपनाया। गाँव के 50 प्रतिषत से अधिक किसानों ने खरीफ में मूंगफली की खेती की, लेकिन इस वर्ष, परिस्थितियां बदल गयीं। पूरे गोरखपुर क्षेत्र में जून-जुलाई, 2020 में दो महीनों के अन्दर 936 मिमी0 बारिष हुई। इस भयंकर बारिष के कारण खेतों में जल-जमाव हो गया और मूंगफली की फसल नुकसान हो गयी। रामनिवास को मौसम एडवायजरी के माध्यम से सूचना मिली कि अप्रैल के अन्तिम सप्ताह से मई प्रथम सप्ताह के दौरान अच्छी बारिष होने की संभावना है। एक नवोन्वेषी किसान होने के नाते, इन्होंने सूचना को गम्भीरता से लिया और मूंगफली की बुवाई पहले ही मई के प्रथम सप्ताह में कर दी। इन्होंने अपने 0.20 डिसमिल खेत में मूंगफली की बुवाई की। इस खेती में इन्होंने लागत के तौर पर रू0 2300.00 लगाया और मूंगफली बेचकर रू0 4300.00 की आय प्राप्त की। इन्होंने वर्ष 2020 में गर्मी की ऋतु में फसल एवं मौसम एडवायजरी से प्राप्त सूचनाओं का अनुसरण किया और प्राप्त सूचना के आधार पर सिंचाई एवं उर्वरकों का उपयोग करते हुए खेती की लागत में 30 प्रतिषत तक कमी की। |
किसानों ने मौसम सम्बन्धी भविष्यवाणियों को 90-95 प्रतिषत तक सही पाया है। दोनों राज्यों में किसानों से प्राप्त फीडबैक के अनुसार, पूर्व तैयारी को बढ़ाने, अनुकूलन क्षमता में वृद्धि करने, सही समय पर खरीफ फसलों की रोपाई, सिंचाई प्रबन्धन, खेत में उर्वरकों एवं कीटनाषकों के प्रयोग में ये डिजिटल सेवाएं बहुत उपयोगी हैं। सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि फसल की कटाई एकदम उचित समय पर हो जा रही है।
किसानों ने यह भी महसूस किया है कि बारिष सम्बन्धी सूचनाओं के सटीक होने के कारण, अनावष्यक सिंचाई की लागत बचती है, समय से धान और सब्जी की बुवाई में मदद मिलती है। 45 किसानों के प्रक्षेत्र आँकड़ों के विष्लेषण से यह पता चलता है कि सिंचाई की लागत तथा कीटनाषक एवं उर्वरकों के उपयोग में 18-20 प्रतिषत की कमी आयी है। यह सेवा लघु एवं सीमान्त किसानों के लिए दिन-प्रतिदिन निर्णय लेने में काफी सहयोगी एवं प्रभावी रही है, जिसका सामूहिक रूप से किसानों की आय पर बड़ा वित्तीय प्रभाव पड़ा है।
आगे का रास्ता
पिछले दो वर्षाें में, इस पहल ने किसानों के हितों को आकर्षित किया है क्योंकि इस पहल की वजह से उन्हंे अपने खेतों में सकारात्मक अन्तर देखने को मिला है और उनकी निर्णय लेने की क्षमता का निर्माण हुआ है। हालांकि, कम समय के भीतर हजारों लोगों तक इस पहल को पहुँचाना आसान नहीं था। प्रारम्भ में, सूचनाओं और इस पहल पर लोगों का विष्वास जमाना संस्था के लिए एक मुष्किल कार्य था। इसके साथ ही कमजोर इण्टरनेट नेटवर्क तथा लोगों द्वारा जल्दी-जल्दी अपने सिमों को बदलना भी प्रमुख चुनौती के रूप में सामने आती है, जिससे लोगों तक सूचनाएं पहुँच पा रही हैं अथवा नहीं, यह जानना मुष्किल होता है और किसानों से नियमित रूप से फीडबैक नहीं मिल पाता है। फिर भी, समुदाय के बीच कृषिगत क्षेत्र पर लम्बे समय तक काम करने का अनुभव एवं स्थानीय भारतीय मौसम विज्ञान विभाग एवं कृषि विष्वविद्यालय के सहयोग से जी0ई0ए0जी0 ने इस पहल को उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक क्रियान्वित किया है।
कृषिगत क्षेत्र में डिजिटल तकनीकों के उपयोग की बहुत संभावनाएं हैं। आज, खेती की बहुत सी गतिविधियों जैसे- स्थानीय स्थिति-परिस्थितियों के अनुकूल बीज को अपनाना, जैव कम्पोस्ट बनाना, बीमारियों एवं कीटनाषकों से फसलों की सुरक्षा करना एवं विभिन्न सोषल मीडिया मंचों जैसे- यूट्यूब, व्हाट्स आदि का उपयोग कर उत्पादों की मूल्यवृद्धि एवं बाजार की खोज जैसे कार्यों पर इस क्षेत्र में किसान विषेषकर युवा किसान अपने स्मार्टफोन सेे जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। इस कार्यक्रम के प्रभाव यह इंगित करते हैं कि मौसम सम्बन्धी सूचनाओं एवं कृषि एडवायजरी से सुसज्जित किया खेती में बेहतर प्रदर्षन कर रहे हैं। उनकी फसल उपज, आय एवं मौसम के उतार-चढ़ावों से निपटने की क्षमता में वृद्धि हुई है। इसलिए, सरकार, व्यापार एवं किसान तीनों के बीच मजबूत सहभागिता के साथ-साथ नियामक वातावरण के माध्यम से खेती सम्बन्धी गतिविधियों में डिजिटल तकनीकों को एकीकृत कीले में और अधिक नवाचार करने की तत्काल आवष्यकता और बहुत अधिक संभावना है ताकि यह सुनिष्चित हो सके कि डिजिटल तकनीक किसानों के लिए सस्ती एवं सुलभ है।
आभार
उत्तर प्रदेष एवं उत्तरी बिहार के जलवायुविक समस्याओं से ग्रस्त क्षेत्रों के लघु एवं सीमान्त किसानों के लिए तकनीक विकसित करने में सहायता प्रदान करने के लिए भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सीड डिवीजन का हम आभार व्यक्त करते हैं। हम जी0ई0ए0जी0 के मौसम वैज्ञानिक श्री कैलाष चन्द पाण्डेय का भी आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने हमारे किसानों के लिए डिजिटल तकनीक का उपयोग करते हुए मौसम एवं कृषि एडवायजरी जारी करने की सेवा को क्रियान्वित किया।
सन्दर्भ
पाण्डेय, के एवं मिश्रा आर, वेदर-एग्रो एडवायजरी: एम्पावरिंग ट्रांसबाउण्ड्री कम्यूनिटिज इन इण्डिया एण्ड नेपाल, 2019, जी0ई0ए0जी0 द्वारा प्रकाषित, https://geagindia.org/sites/default/files/2020-03/paper-weather-Agro-Advisories-Revised-190904.pdf
बिजय कुमार सिंह, अजय कुमार सिंह एवं अर्चना श्रीवास्तव
डॉ0 बी0के0 सिंह वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी अजय कुमार सिंह प्रोग्राम प्रोफेषनल अर्चना श्रीवास्तव कार्यक्रम अधिकारी गोरखपुर एन्वायरन्मेण्टल एक्षन ग्रुप 224, पुर्दिलपुर, एम0जी0 कालेज रोड गोरखपुर - 273 001, उत्तर प्रदेष, भारत
Source: Digital Agriculture, LEISA India, Vol.22, No.2, June 2020



