हमारा बगीचा, हमारा जीवन

Updated on June 1, 2021

पूरी दुनिया में, विषेषकर शहरांे और कस्बों में ‘‘अपना भोजन स्वयं उगायें’’ की अवधारणा लोकप्रिय हो रही है। तीव्र शहरीकरण ने हमारे सड़कों एवं गलियों को प्रदूषित करने वाले ठोस अपषिष्टों की मात्रा में वृद्धि की है और जल एवं ईंधन का संकट तथा गरीबी बढ़ाने में योगदान दिया है। प्रत्येक घर के पीछे की खाली जमीन या फिर छत पर तैयार की गयी गृहवाटिका के माध्यम से इन चुनौतियों से निपटा जा सकता है। यह स्वस्थ शहरी पर्यावरण तैयार करने तथा लोगों के बीच व्यवहार परिवर्तन करने हेतु हरित बुनियादी ढांचागत रणनीति का एक हिस्सा हो सकता है। नागरिकों को अपने सब्ज़ी बागानों या गृहवाटिका में उपयोग के लिए खाद बनाने हेतु उत्साहित करना चाहिए, जिससे जमीन भरने हेतु कचरे की मात्रा में कमी की जा सके।

ऐसे बगीचों को स्थापित करने से कई प्रकार के फायदे हो सकते हैं। सुरक्षित, पोषणयुक्त एवं ताजा भोजन तक उनकी पहुंच बढ़ती है, अपषिष्ट प्रबन्धन की तरफ उत्साहित होते हैं, जिससे पर्यावरण स्वच्छ रहता है और स्वास्थ्य सम्बन्धी खतरे कम होते हैं। इसके साथ ही नाजुक समूहों को अतिरिक्त आमदनी होती है, नागरिकों को सकारात्मक कार्यों में जुड़े रहने हेतु प्रोत्साहन मिलता है और तापमान में कमी तथा कार्बन उत्सर्जन कम होता है।

गृहवाटिका के साथ मेरे अनुभव
मैं वर्ष 2000 से त्रिची में रह रहा हूं। पहले, हम शहर के मध्य भाग में एक किराये के घर में रहते थे और वहाँ पर कोई भी ऐसी खाली जगह नहीं थी, जहाँ हम कुछ उगा सकें। हमने बोतलों और अन्य डिब्बों का उपयोग कर अिपनी बालकनी में कुछ साग एवं जड़ी-बूटियां उगायीं। एक वर्ष बाद, हम अपने स्वयं के मकान में रहने चले आये जो त्रिची के बाहरी हिस्से में स्थित था। हमने 800 वर्गमीटर के क्षेत्रफल में अपना मकान बनवाया और गृहवाटिका लगाने के लिए हमने लगभग 1600 वर्गमीटर अथवा पूरी जमीन का दो-तिहाई हिस्सा खाली रखा।
पौध विज्ञान से मेरी पढ़ाई तथा तमिलनाडु के त्रिची में स्थित एक स्वैच्छिक संगठन कुडुम्बम से 1995 से ही जुड़ाव होने के कारण मुझे स्थाई कृषिगत तकनीकों का उपयोग कर गृहवाटिका तैयार करने में मुझे मदद मिली। सबसे पहले हमने घर के चारों तरफ बाड़ लगाया। तत्पष्चात्, अपनी गृहवाटिका को डिजाइन करना प्रारम्भ किया।

मेरी पत्नी गजा, मेरी बेटी श्रुति, मेरा बेटा हरीष एवं स्वयं मैं सहित मेरे परिवार के सभी सदस्यों ने मिलकर गृहवाटिका की डिजाइन की। गृहवाटिका को डिजाइन करने का हमारा विचार बहुत ही सरल था। हमने बहुत छोटी सी शुरूआत की। प्रारम्भ में हमने उन्हीं पौधों को लगाया, जिन्हें खाने में हमारी रूचि थी। हमने अपने परिवार की रसोई की जरूरतों का सरल सा विष्लेषण किया और उन्हें अल्पकालिक आवष्यकताओं के रूप में श्रेणीबद्ध किया जबकि गैर रसोई आवष्यकताआंे को दीर्घकालिक आवष्यकताओं के रूप में चिन्हित किया। हम अपनी गृहवाटिका पर खर्च करने को लेकर बहुत सतर्क थे। हमने कचरा, उसका पुनर्चक्रीकरण और पुर्नउपयोग के सिद्धान्त पर काम करने का निष्चय किया। इस प्रकार हमने आठ महीने पहले अपने घर के पीछे एक छोटी सी गृहवाटिका स्थापित की।

रसोई के लिए पौधे
हमारे रसोई में काम आने के लिए, हमने पोई (स्थानीय नामः कोदईपसलाई (वैज्ञानिक नामः बसिला अल्बा)), गूधड़ी साग (स्थानीय नामः बोन्ननगनी (वैज्ञानिक नामः अल्टरनानथेरा सेसिलिस)), लाल पोई (स्थानीय नामः कुथुपसलाई (वैज्ञानिक नामः बसिला रबरा)), किण्वित पालक (स्थानीय नामः पुलिचकेराई (वैज्ञानिक नामः हिबिसकस कन्नाबिन्नअस)), मेथी (स्थानीय नामः वेन्ध्या केराई (वैज्ञानिक नामः फेनुग्रीक)), सहजन (स्थानीय नामः मुरूंगाकेराई (वैज्ञानिक नामः ड्रमस्टिक लीव्स)) जैस साग को अपनी गृहवाटिका में लगाया। इन सभी सागों को हम सुबह के नाष्ते और दोपहर के भोजन में करते हैं। सामान्यतः हम रात के खाने में साग का उपयोग नहीं करते हैं। हमने करी पत्ता भी लगा रखा है, जिसका मौसमी उपयोग होता है। हमारी गृहवाटिका में टमाटर, भिण्डी, बैगन, भंटकटिया, सेम, सहजन, करैला, लम्बी लौकी, गोल लौकी जैसी सब्ज़ियां हैं, जिनका उपयोग हम सांभर और पोरियाल जैसे व्यंजन बनाने में करते हैं।

स्वास्थ्य के लिए पौधे
हमने अपनी गृहवाटिका में काली तुलसी, घृतकुमारी, अरूसा, दूब, बांस, कंटककारी लता, हड़जोड़ा, पान, लेमनग्रास, रानाकाली, अजवायन, कीलानेल्ली, बनारसी राई, करी पत्ता, इन्सुलिन पौध, मारूथानी एवं कुप्पीखोखली या जवा जैसे औषधीय पौधों को भी लगा रखा है। हम इस टुकड़े को हमारे घर की फार्मेसी कहते हैं। सर्दी, खांसी, नाक बहना, बुखार, शरीर दर्द, सरदर्द एवं कब्ज़ जैसी सामान्य बीमारियों के उपचार के लिए हम इन पौधों का उपयोग करते हैं। इनसे शारीरिक तापमान, रक्तचाप एवं ब्लड शुगर जैसी बीमारियों के नियंत्रण में भी सहायता मिलती है। इन औषधीय वनस्पतियों को कच्चा ही खाया जा सकता है अथवा इनका हर्बल चाय, सूप, सांभर एवं चटनी बनाकर भी उपयोग कर सकते हैं।

धार्मिक कार्यों के लिए पौधे
हमारी गृहवाटिका में जैसमीन, गुड़हल, गुलब्बास या कृष्णकली, जठी मली, बोगनबेलिया, सुलतान चम्पा जैसे फूलों के पौधे भी हैं। जैसमीन के फूल हमारी पत्नी और पुत्री के लिए हैं, जबकि अन्य दूसरे फूलों को हम अपने पूजाघर में भगवान के चरणों में चढ़ाते हैं। प्रत्येक सुबह, हम पूजाघर से पुराने फूलों को एकत्र कर कम्पोस्ट पिट में डाल देते हैं और पूजाघर में भगवान को ताजा फूल चढ़ाते हैं। गुड़हल की पंखुड़िया रक्त शुद्धिकरण के लिए अच्छी होती हैं। इसलिए जिस दिन भगवान के चरणों में गुड़हल का फूल चढ़ाया जाता है, हम पंखुड़ियों का सेवन कर लेते हैं।

वृक्ष

हमने बहुउपयोगी वृक्षों की भी विभिन्न प्रजातियां लगा रखी हैं। हमारी गृहवाटिका में फलदार वृक्ष जैसे- आम, पपीता, काजू, कटहल, अमरूद, इमली, केला एवं अमला हैं। हमारी गृहवाटिका में सागौन, लाल चन्दन, जंगली सरू, नीम एवं पारस पीपल जैसे इमारती मूल्य के वृक्ष भी हैं। फलदार वृक्ष दो वर्षों में फल देने लगेंगे, जबकि इमारती लकड़ियों वाले वृक्षों से हमारे परिवार को दीर्घकालिक अवधि में लाभ मिलेगा।

छोटी चीजें, जो बड़ा बदलाव लाती हैं
हमारे बगीचे में बहुत से स्थानों पर, प्यासी चिड़ियों के लिए हमने प्लास्टिक की बोतलों में पानी भरकर रख दिया है। जब वे पानी पीने आती हैं, तो वे बगीचे में कीटों को खाकर कीट प्रबन्धन का कार्य भी करती हैं। हम बगीचे में लगने वाले कीटों से परेषान नहीं होते, क्योंकि ये बगीचे सिर्फ हम मनुष्यों के लिए ही नहीं है, वरन् सभी जीवों के लिए है। मोर, मैना, गौरैया हमारे बगीचे में नियमित रूप से आती हैं। हमने गौरैयों को अपना घोंसला बनाने के लिए एक निष्चित स्थान भी दे रखा है, जहां उन्हें किसी प्रकार का कोई व्यवधान न उत्पन्न हो। यदि हम अपने बगीचे में कहीं भी खुदाई करते हैं तो हमें बहुत से केंचुए मिलते हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि हमारे बगीचे की मृदा स्वस्थ एवं उर्वर है।

अपनी गृहवाटिका में सुबह जब हम एक घण्टे तक काम करते हैं तो इस गृहवाटिका के माध्यम से, हम प्रत्येक सुबह ताजी हवा प्राप्त करते हैं। इससे हमें स्वस्थ और फिट रहने में मदद मिलती है और साथ ही यह हमारे परिवार को प्रकृति के निकट लाता है साथ ही हमें प्रकृति से मिले उपहारों का आनन्द लेना सिखाता है। पुनर्चक्रीकरण की अवधारणा का प्रायोगिक अनुभव करने के लिए यहाँं पर पर्याप्त स्थान है। बगीचे से सब्ज़ियां, फल, साग एवं फूल रसोई में आते हैं और रसोई से निकला अपषिष्ट खाद एवं तरल खाद के रूप में पुनः बगीचे में वापस जाता है। सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि, हमने अपने बीजों को संरक्षित रखना प्रारम्भ कर दिया है और सब्ज़ियों, दलहन, औषधीयों, सागों एवं फूलों के बीजों का एक बीज बैंक बना लिया है।

यह जीवन का एक पारिस्थितिक एवं सुधारात्मक तरीका है। हमने अपषिष्ट, उसके पुनर्चक्रीकरण एवं पुर्नउपयोग के सिद्धान्त पर ध्यान केन्द्रित किया है। सभी पौधे पहले उपयोग में लाये गये प्लास्टिक के टब एवं बोतलों में उगाये जाते हैं। हमारे बगीचे के अधिकांष उपकरण बेकार समझी जाने वाली वस्तुओं से बने हुए हैं। हम अपने बगीचे के साथ व्यापक रूप से मुर्गी, मछली एवं बकरी पालन जैसे अधिक घटकों को एकीकृत करने की उम्मीद करते हैं।

हम अपने बगीचे से निकले बहुत से उत्पादों को अपने पड़ोसियों, रिष्तेदारों, दूधवाले एवं सफाईकर्मियों को मुफ्त में बाँट देते हैं। इससे हमें अपने पड़ोसियों के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार बनाने में मदद मिलती है और वे भी अपना स्वयं का बगीचा तैयार करने हेतु उत्साहित होते हैं।

कोविड-19 के कारण दो माह तक लॉकडाउन लगा रहने के कारण हमारे परिवार ने बगीचे में अधिक समय बिताया, जिसका परिणामस्वरूप बगीचे से हमें फूल, फल, साग एवं सब्ज़ियों का भरपूर उत्पादन मिला। सुबह की इलेक्ट्रानिक अलार्म के स्थान पर पक्षियों की चहचहाहट से हमारी नींद खुलने लगी। इस प्रकार हमारे परिवार ने यह महसूस किया कि हमारे बगीचे ही हमारा जीवन हैं। ?

सुरेष कन्ना


सुरेष कन्ना
कुडुम्बम
नं0 113/118, सुन्दराज नगर, सुब्रमण्यपुरम
त्रिची-620 020
तमिलनाडु, भारत
ईमेल:sureshkanna_kudumbam@yahoo.in

Source: Small farmers and safe vegetable cultivation, LEISA India, Vol.22, No.3, September 2020

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