शहरी डेयरियों को अधिक टिकाऊ बनाना

Updated on September 3, 2023

पूरे विश्व में कोयला, तेल एवं गैस जैसे ऊर्जा के गैर नवीनीकरण वाले स्रोतों पर मानव जाति की निर्भरता बढ़ती जा रही है। अब समय आ गया है कि ऊर्जा के आसानी से उपलब्ध होने वाले, किफायती एवं पर्यावरण सम्मत नवीनीकरणीय स्रोतों जैसे- गाय के गोबर आदि की तरफ बदलाव किया जाये, जो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।


मन्दिरों का शहर जम्मू, ढेर सारी छोटी-छोटी डेयरियों से भरा पड़ा है। एक तरफ जहां ये डेयरियां स्थानीय समुदायों के लिए ताजा दूध प्राप्त करने हेतु बहुत महत्वपूर्ण हैं, वहीं दूसरी तरफ ये चिन्ता का कारण भी हैं। गाय के गोबर को कालोनियों की नालियों में बहाया जा रहा है, जिससे पहले से भरी व जाम नालियां और अधिक जाम हो जा रही हैं। अस्थाई ही सही, परन्तु गोबर भण्डारण के लिए जगह न होने के कारण इस नालियों में बहाना जरूरी हो जाता है। इन अपशिष्टों जैसे- गोबर व जानवरों के मूत्र को शहरी डेयरियों से खरीदने और उन्हें विभिन्न उत्पादों के रूप में पुनर्चक्रित करने की आवश्यकता है।

पशुओं के गोबर को कई तरीकों से पुनर्चक्रित किया जा सकता है। इसे बायो-गैस के लिए प्रसंस्कृत किया जा सकता है और फिर इसे कम्प्रेस्ड बायो गैस (सीबीजी)/कम्प्रेस्ड प्राकृतिक गैस (सीएनजी) के परिवर्तित किया जा सकता है, जिसका उपयोग डेयरी/दुग्ध प्रसंस्करण इकाईयां अपने ब्वायलर प्लाण्ट को चलाने के लिए रेस्तरां, बिजली के लिए जनरेटर चलाने, सड़कों को प्रकाशमान बनाने एवं अन्य दूसरे उद्योगों द्वारा मांग के आधार पर किया जा सकता है। शेष बचे हुए गोबर व मूत्र एवं बायोगैस प्लाण्ट से बड़ी मात्रा में निकलने वाले घोल का उपयोग बड़े पैमाने पर वर्मी कम्पोस्ट बनाने, श्मशान लाग बनाने, पर्यावरण अनुकूल लैम्प, पेण्ट, मूर्तियां, फूलदान, जैव उर्वरक, उपला आदि बनाने में किया जा सकता है। यह व्यापारिक रूप से व्यवहार्य एवं स्थाई व्यापार का एक तरीका हो सकता है। इसके साथ ही, एकत्र किये गये पशुु मूत्र का उपयोग जैव-कीटनाशक, कीट विकर्षक, दवाएं आदि बनाने के लिए शोधित कर किया जा सकता है।

गाय का गोबर पुनर्चक्रीकरण करने के कई फायदे हैं- इससे एक तो दुग्ध का व्यवसाय करने वाले किसानों की आय बढ़ती है, हरित नौकरियों के माध्यम से रोजगार सृजन होता है, स्थाई कृषि और पशुधन विकास को बढ़ावा मिलता है, शहर साफ और हरे-भरे रहते हैं। आई0एल0ओ0 के एक अध्ययन के अनुसार, गोबर का उत्पादक उपयोग करने के माध्यम से भारत के ग्रामीण और शहरी परिधीय क्षेत्रों में 2 लाख लोगों को हरित और बेहतर नौकरियों का सहयोग किया जा सकता है। यह अध्ययन यह भी बताता है कि एक किग्रा0 गाय के गोबर का अधिकतम उपयोग किया जाये तो उसका मूल्य 10 गुना से भी अधिक हो जाता है।

पशुओं के गोबर से तैयार किये जा सकने वाले कुछ उत्पादों के बारे में यहां दिया जा रहा है-

बायो-कम्प्रेस्ड प्राकृतिक गैस (बायो-सीएनजी) अथवा कम्प्रेस्ड बायो-गैस (सीबीजी) एक स्वच्छ और उर्जा का अक्षय स्रोत है, जो गाय के बेकार गोबर से प्राप्त होता है। बायो-सीएनजी में 92-98 प्रतिशत तक मीथेन होता है, कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा केवल 2-8 प्रतिशत तक होती है। बायो-सीएनजी में कैलोरिफिक की मात्रा प्रति किग्रा0 लगभग 52,000 किलोजूल (केजे) होती है, जो बायोगैस की तुलना में 167 प्रतिशत अधिक होती है।

वर्तमान में, 46,178 किग्रा0/दिन की संयुक्त क्षमता के साथ भारत में सत्रह बायो-सीएनजी इकाईयां संचालित हैं। कर्नाटक के कोलार जिले में अवस्थित मालूर में स्थित बायो-सीएनजी इकाई में प्रति 40 टन गीले अपशिष्ट से 1.6 टन बायो-सीएनजी उत्पादित होती है।

प्राकृतिक/वैदिक पेण्ट: खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग द्वारा गाय के गोबर से ‘‘खादी प्राकृतिक पेण्ट’’ तैयार कर पशुपालकों के लिए अतिरिक्त आय के स्थाई स्रोत की खोज की गयी। गाय के गोबर से तैयार प्राकृतिक/वैदिक पेण्ट प्लास्टिक या सिन्थेटिक सामग्रियां रहित, शीशा, पारा, कोमियम, आर्सेनिक और कैडमियम जैसे भारी धातुओं से मुक्त होने के कारण यह ‘‘स्वस्थ उत्पाद’’ भी है। इससे आमतौर पर सिन्थेटिक पेण्टों में मौजूद भारी धातुओं के नुकसानदायक प्रभावों को कम करने में सहायता मिलेगी।

गाय के गोबर से बना पेण्ट किसानों के लिए एक संभावित आय बढ़ाने वाला है। पर्यावरण-सम्मत, गैर-विषाक्त व गन्धहीन उत्पाद होने के साथ ही फंफूदरोधी व जीवाणुरोधी इस पेण्ट के माध्यम से एक किसान को एक गाय से प्रतिवर्ष रू0 30,000.00 की अतिरिक्त आय हो सकती है। खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के अनुसार, आने वाले कुुछ वर्षों में इन पेण्टों से लगभग रू0 6,000.00 करोड़ की बिक्री होने की संभावना है। किसानों को कच्चा माल अर्थात गाय का गोबर बेचने से रू0 1,000.00 करोड़ बचने की उम्मीद है, जो अभी बहुत बड़े पैमाने पर बरबाद हो जाता है।

500 लीटर प्राकृतिक पेण्ट तैयार करने के लिए लगभग 150-170 किग्रा0 गोबर की आवश्यकता होती है। 500 लीटर प्रतिदिन पेण्ट उत्पादित करने की क्षमता रखने वाला एक प्लाण्ट लगाने के लिए रू0 20.00 लाख निवेश करने की आवश्यकता होती है जो एमएसएमई के तहत् सरकारी योजना द्वारा अनुदानित होगी। प्रत्येक प्लाण्ट से 11 लोगों को सीधे रोजगार मिलेगा। इसलिए खादी प्राकृतिक पेण्ट में सर्वाधिक गरीब लोगों के लाभ हेतु स्थाई विकास करने की अपार संभावना है।

वर्मी कम्पोस्टिंग: सरल तकनीक होने के कारण बहुत से किसान वर्मी कम्पोस्ट बनाने में लगे हुए हैं। इससे मृदा स्वास्थ्य बेहतर होता है, मृदा की उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती है और खेती की लागत में कमी आती है। वर्मी कम्पोस्ट में पोषण तत्वों की उच्च मात्रा होने के कारण इसकी मांग धीरे-धीरे बढ़ रही है। यद्यपि जम्मू में बहुत से प्रगतिशील किसान, वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने और बेचने के कार्य में संलग्न हैं, फिर भी पारम्परिक रूप से खेती करने के बजाय जैविक/प्राकृतिक खेती की तरफ प्रवृत्त होने वाले किसानों को व्यापक सहयोग प्रदान करने और वर्मी कम्पोस्ट उपलब्ध कराने हेतु बड़े पैमाने पर, व्यवसायिक रूप से वर्मी कम्पोस्ट उत्पादित करने की कोई इकाई नहीं है।

गाय के गोबर से कण्डा/ उपला तैयार करना गोबर को पुनर्चक्रित करने का एक और माध्यम है: यूएन की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में दाह संस्कार हेतु ईंधन के लिए प्रतिवर्ष लगभग 5 करोड़ पेड़ों की कटाई की जाती है। फिर भी, आज की तारीख में भी, लकड़ी को स्थानापन्न करते हुए गोबर के कण्डों के प्रभावी उपयोग हेतु सरकार की कोई बड़ी योजना नहीं है। जम्मू में, विद्युत से शवदाह की कोई व्यवस्था नहीं है और दाह संस्कार के लिए लोग केवल पेड़ों की लकड़ियों का ही उपयोग करते हैं। इसलिए यहां पर लकड़ियों के बजाय गाय के गोबर से तैयार कण्डा एक बेहतर विकल्प है।

गाय के गोबर से सम्बन्धित कुछ तथ्य:

* एक अनुमान के अनुसार एक गाय से प्रतिवर्ष 3500 किग्रा0 गोबर, 2000 लीटर मूत्र प्राप्त होता है, जिससे 4500 क्यूबिक फीट बायोगैस और 100 टन जैविक खाद बनती है। जैविक खाद के उत्पादन प्रयोग से फसल में 20 से 30 प्रतिशत की वृद्धि होती है।

* गाय के गोबर से तैयार 1 किग्रा0 खाद में समान मात्रा में पानी मिलाकर उसे 55-60 दिनों तक के हाइड््रोलिक रिटेन्शन टाइम के साथ 24-26 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर रखा जाता है तो 35-40 लीटर बायोगैस उत्पादित होता है। (कालिया और सिंह, 2004)

* 3-5 पशुओं द्वारा प्रतिदिन प्राप्त गोबर से 8-10 घनमीटर का एक साधारण बायोगैस प्लाण्ट संचालित किया जा सकता है, जिससे 1.5-2 घन मीटर बायोगैस प्रतिदिन उत्पादित होगा। 6-8 सदस्यों वाले एक परिवार के लिए दो या तीन समय खाना बनाने अथवा तीन घण्टे तक दो बल्ब जलाने या पूरे दिन एक फ्रिज चलाने के लिये यह मात्रा पर्याप्त होती है। इसके साथ ही इससे एक 3 किलोवाट मोटर का जनरेटर भी एक घण्टे तक चलाया जा सकता है। (वार्नर एट ऑल, 1989)

 

निष्कर्ष
एक मॉडल प्रशिक्षण केन्द्र के तौर पर गोबर और मूत्र आधारित उद्यम इकाई को विकसित किया जा सकता है, जहां पूरे भारत से इच्छुक उद्यमी (जम्मू आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु) आकर एक ही स्थान पर गोबर और मूत्र आधारित उत्पादों को तैयार करना सीख सकते हैं। इसके अलावा, इस प्रशिक्षण केन्द्र को भविष्य में गोबर और मूत्र आधारित उत्पादों पर शोध एवं विकास में भी संलग्न किया जा सकता है।

प्रणव कुमार, मनिन्दर सिंह


प्रणव कुमार
वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर


मनिन्दर सिंह
पशु चिकित्सा विज्ञान में परास्नातक स्कॉलर
पशु चिकित्सा एवं पशुपालन प्रभाग
विस्तार शिक्षा,
शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय-जम्मू
आर.एस.पुरा, जम्मू (जम्मू एवं कश्मीर का संघशासित राज्य)
भारत - 181 102

Source: Renewable Energy, LEISA India, Vol. 22, No.4, Dec.2022

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