कृषि की ओर युवाओं को आकर्षित करना व उससे जोड़े रखना (आर्या)

Updated on January 12, 2026

देश के कृषिगत विकास में ग्रामीण युवाआंे के महत्व को समझते हुए, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (इण्डियन कौंसिल आॅफ एग्रीकल्चर रिसर्च (आई.सी.ए.आर.) ने पलायन को रोकने तथा ग्रामीण युवाओं की क्षमता का पूर्ण उपयोग करने के लिए आर्या परियोजना को क्रियान्वित किया।


किसी भी देश की जनसंख्या का सबसे बड़ा हिस्सा युवा होते हैं। युवाओं के अन्दर असीमित उत्साह व कुछ नया करने की क्षमता होती है और इसी के बलबूते वे देश के कार्यबल को सशक्त बनाते हैं। यूएनडीईएसए (2011) के अनुसार, वर्ष 2050 तक विश्व की जनसंख्या अनुमानतः 9 अरब हो जायेगी और 15 से 24 वर्ष आयुवर्ग के बीच के युवाओं की संख्या भी 1.3 अरब हो जाने का अनुमान है। यह अनुमानित जनसंख्या का 14 प्रतिशत है। यह एक अच्छी बात है कि भारत युवाओं से समृद्ध देश है, लेकिन वहीं यह भी चिन्ताजनक है कि खेती के प्रति युवाओं की रूचि कम हो रही है।

बदलती वैश्विक अर्थ-व्यवस्था के साथ सामंजस्य बनाये रखने के लिए कृषि सुधार में युवाआंे की भागीदारी महत्वपूर्ण है। देश के लिए खाद्य सुरक्षा में स्थाईत्व लाने हेतु कृषि में उच्च वृद्धि आवश्यक है, क्योंकि भविष्य में खाद्यान्नों की मांग में और अधिक वृद्धि होगी। इन विविध मांगों के साथ सामंजस्य बनाये रखने के लिए, कृषि का आधुनिकीकरण व विविधीकरण आवश्यक है। पर्याप्त अवसर मिलने पर, युवाओं को शामिल कर देश में कृषि की स्थिति को और बेहतर बनाया जा सकता है। युवा किसानों में जोखिम लेने की क्षमता बड़ी उम्र के किसानों की अपेक्षा अधिक होती है। उदाहरणस्वरूप, कई युवा किसान संरक्षित कृषि, सटीक खेती, जैविक कृषि, फूलों की खेती, औषधीय व सुगन्धित पौधों की खेती आदि उच्च तकनीक, उच्च जोखिम व उच्च लाभ वाले कृषि तकनीकों को कर रहे हैं।

आँकड़े बताते हैं कि ग्रामीण युवाओं का शहरों की ओर पलायन लगभग 45 प्रतिशत है, जो काफी चिन्ताजनक है। शहरों की ओर पलायन के प्रमुख कारणों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव, बेरोजगारी, विभिन्न कारकों जैसे- प्राकृतिक आपदाएं, छोटी जोत व कृषि उपज का उचित बाजार न मिलने जैसे कारकों के कारण खेती में रूचि न होना आदि शामिल हैं। युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों का अभाव प्रमुख वैश्विक आर्थिक संकटों में से एक है। इस संकट का एक बड़ा प्रभाव मंहगाई का बढ़ना है, जिससे खाद्य पदार्थों, वस्तुओं व ईंधनों की कीमतें बढ़ जाती हैं।

आर्या – कृषि की ओर युवाओं को आकर्षित करना व उससे जोड़े रखना
देश के कृषिगत विकास में ग्रामीण युवाआंे के महत्व को समझते हुए वर्ष 2015-16 में, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषाद (आईसीएआर) ने ‘‘कृषि की ओर युवाओं को आकर्षित करना व उससे जोड़े रखना (आर्या)’’ नामक परियोजना का क्रियान्वयन किया। 35 वर्ष से कम आयु के ग्रामीण युवाआंे की क्षमता का पूर्ण उपयोग खेती में करना तथा शहरी क्षेत्रों से ग्रामीण क्षेत्रो की ओर वापसी इस परियोजना का प्रमुख उद्देश्य था। यह परियोजना सामाजिक समावेशन, लैंगिक समानता व ग्रामीण विकास के सिद्धान्तों पर आधारित है और निम्नलिखित उद्देश्य इसे स्थाईत्व प्रदान करते हैं –
ऽ चुनिन्दा जिलों में स्थाई आय तथा लाभप्रद रोजगार के लिए कृषि, कृषि सम्बन्धित एवं सेवा सेक्टर सम्बन्धी उद्यमों को करने हेतु ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं को आकर्षित व सशक्त करना।
ऽ प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन एवं विपणन जैसे संसाधन एवं पूंजी-सघन गतिविधियों को करने हेतु नेटवर्क समूह स्थापित करने की दिशा में युवाओं को सक्षम बनाना।
ऽ युवाओं के स्थाई विकास हेतु विभिन्न योजनाओं/कार्यक्रमों के अन्तर्गत उपलब्ध अवसरों के अभिसरण के लिए विभिन्न संस्थानों व हितधारकों के साथ क्रियात्मक सम्बन्ध प्रदर्शित करना।
ऽ विशिष्ट कृषि साझेदारी माॅडल अपनाने में युवाओं की क्षमता को बढ़ाना।
ऽ प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन एवं विपणन जैसी संसाधन एवं पूंजी-सघन गतिविधियों को आगे बढ़ाने हेतु एक नेटवर्क समूह स्थापित करना।
आर्या परियोजना को कृषि विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से 25 राज्यों (प्रत्येक राज्य से एक जिला) में क्रियान्वित किया गया था। वर्तमान में, इन 25 केन्द्रों के साथ, 75 और केन्द्रों इस प्रकार कुल 100 केन्द्रों से आर्या परियोजना का क्रियान्वयन किया जा रहा है। कृषि विज्ञान केन्द्र कृषि विश्वविद्यालयों व भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद संस्थानों को तकनीक सहभागी के रूप में शामिल करते हैं।

ग्रामीण उद्यमिता के प्रकार:
ग्रामीण उद्यमिता को गरीबी व बेरोजगारी कम करने तथा पलायन रोकने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए एक समाधान के तौर पर देखा जा सकता है। किसी भी क्षेत्र विशेष में सफल उद्यमिता के विकास का मुख्य आधार सर्वोत्तम उद्यम का चयन होता है। मुख्य रूप से, संसाधनांे की उपलब्धता, कच्चा माल, श्रम शक्ति व कृषि-पारिस्थितिक स्थाईत्व ग्रामीण क्षेत्रों में सफल उद्यमिता के प्रमुख कारक हैं। आर्या परियोजना के अन्तर्गत, उपरोक्त मानदण्डों के आधार पर, विभिन्न केन्द्रों पर विभिन्न उद्यमों का चयन किया जाता है। इसमें मधुमक्खी पालन, मशरूम की खेती, कटाई के बाद प्रसंस्करण व मूल्य संवर्धन, मछली उत्पादन, बीज उत्पादन, वर्मी कम्पोस्टिंग, बकरी पालन, बैकयार्ड मुर्गी पालन आदि उद्यम शामिल हैं।

उद्यमिता विकास प्रक्रिया
विभिन्न कृषि विज्ञान केन्द्रों में, चरणबद्ध प्रक्रिया के तहत् विविध प्रकार की उद्यमिता प्रशिक्षण गतिविधियां संचालित की गयीं।
ऽ दिशा-निर्देश के अनुसार, प्रत्येक आर्या केन्द्र द्वारा 18-35 वर्ष आयु वर्ग के 200 युवाओं का चयन उनकी आवश्यकताओं एवं उपलब्ध संसाधनों के आधार पर किया जाता है। इन ग्रामीण युवाओं का चयन जेण्डर एवं सामाजिक-आर्थिक स्थिति आधारित बेसलाइन सर्वेक्षण के आधार पर किया जाता है। संभावित ग्रामीण युवाओं की चयन प्रक्रिया में प्रत्येक स्तर पर मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए एक जिला स्तरीय समिति का गठन किया जाता है।
ऽ क्षेत्र के स्वाॅट विश्लेषण के आधार पर, उचित उद्यम की पहचान की जाती है। ग्रामीण युवाओं को जोड़ने के लिए उपयुक्त संभावित उद्यमों की पहचान की जाती है।
ऽ ग्रामीण युवाओं के चयन के बाद, कृषि विज्ञान केन्द्रों द्वारा आवश्यक तकनीक व व्यवसायिक दक्षता पर केन्द्रित आवश्यकता-आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं।
ऽ दक्षता प्रशिक्षण के बाद, उद्यम को लगाने व अपने आस-पास बाजार की संभावना पर आधारित आर्थिक माॅडल स्थापित करने हेतु कृषि विज्ञान केन्द्र युवाओं की मदद करता है।
ऽ तकनीकी सहायता के साथ-साथ अन्य हितभागियों के साथ जुड़ाव को कृषि विज्ञान केन्द्र, आईसीएआर व राज्य कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा फैसिलिटेट किया जाता है।
ऽ विभिन्न स्तरों पर समितियों द्वारा सहायतित विस्तृत मूल्यांकन प्रक्रिया के साथ, एक साथ मिलकर निरन्तर निगरानी, मूल्यांकन व मध्यावधि सुधार परियोजना क्रियान्वयन का अभिन्न अंग है।
ऽ व्यवस्थित मूल्यांकन के आधार पर, उद्यम में स्थिरता लाने व उसे लाभप्रद बनाने के लिए उद्यम को संशोधित व अनुकूलित किया जाता है।
ऽ नेटवर्क बनाने व मूल्य श्रृँखला प्रबन्धन सहित अधिक पूँजी वाले उद्यम प्रारम्भ करने में ग्रामीण युवाओं/उद्यमियों को सक्षम बनाने पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है।
ऽ कृषि-व्यापारों में जोखिमों से निपटने व उनका प्रबन्धन करने हेतु सक्षम प्रशिक्षकों के निर्देशन में उद्यमशीलता प्रेरणा प्रशिक्षण आयोजित किये जाते हैं।

बाक्स 1: केस – 1
वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन: वर्मीकम्पोस्ट पोषक तत्व समृद्ध, प्राकृतिक उर्वरक व मृदा शोधक है। यह अत्यन्त महीन दानों वाला, एक समान, स्थिर व नमीयुक्त कार्बनिक पदार्थों से भरपूर होता है। यह अत्यन्त भुरभुरा होता है, जिससे इसमें पर्याप्त वायु संचार होता है व इसके अन्दर जल धारण करने की क्षमता होती है। कृषि अपशिष्ट, पशुआंे के मल-मूत्र, रसाई के अपशिष्ट आदि के उचित प्रबन्धन हेतु पूरे विश्व में वर्मीकम्पोस्ट पहले से ही बनाया जा रहा है।

उद्यमशीलता को विकसित करने हेतु कृषि विज्ञान केन्द्र, साोलापुर -1, महाराष्ट्र ने वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन पर विशेष रूप से केन्द्रित करते हुए 25 ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित किया। समग्र रूप से देखें, तो वर्ष 2019-20 में 21 युवाआंे ने अपना उद्यम स्थापित किया। चार युवाओं ने 50-80 टन उत्पादन प्रति वर्ष की क्षमता वाले बड़ी उत्पादन इकाईयों को लगाया। शेष युवाओं ने 4-5 टन प्रति वर्ष उत्पादन क्षमता वाले लघु उद्यमों को स्थापित किया। बड़ी उत्पादन इकाईयों से प्रतिवर्ष औसतन रू0 5,60,000.00 मूल्य का 70 टन वर्मीकम्पोस्ट उत्पादित हुआ। लघु उद्यमों से रू0 40,000.00 मूल्य का 5 टन वर्मीकम्पोस्ट उत्पादित हुआ। इस प्रकार वर्मी कम्पोस्ट की बड़ी इकाईयां लगाने वाले युवा को रू0 5-5.5 लाख रू0 की तथा लद्यु उद्यम लगाने वाले युवा को रू0 40,000.00 की वार्षिक आय होती है।

वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन से आय होने के अतिरिक्त, तीन युवाओं ने अन्य उत्पादों जैसे- केंचुआ व वर्मीवाॅश से भी आय प्राप्त की। इस प्रकार, अन्य उत्पादों की बिक्री से तीनों युवाओं को प्रतिवर्ष रू0 80,000.00-रू0 1,20,000.00 प्रतिवर्ष की आय हुई।

इन उत्पादों की बिक्री सोलापुर व उस्मानाबद जिले के स्थानीय किसानों को की जा रही है। अधिकाँश युवा अपने खेतों में वर्मीकम्पोस्ट का प्रयोग कर रहे हैं और रासायनिक उर्वरकों पर लगने वाली लागत को कम कर रहे हैं साथ ही उत्पाद की गुणवत्ता में भी सुधार कर रहे हैं। कुछ युवाआंे ने अपनी पैकेजिंग सुविधा भी प्रारम्भ कर दी है। प्रति इकाई 39 ग्रामीण युवाआंे के लिए रोजगार का सृजन हुआ, जिससे औसतन प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति को 75 दिन का रोजगार मिला।

 

आईसीएआर-अटारी, पुणे के अन्तर्गत ज़ोन 8 में क्रियान्वयन व उपलब्धियां
ज़ोन-8 पुणे में प्रारम्भ में दो कृषि विज्ञान केन्द्रों – महाराष्ट्र के नागपुर-1 व गुजरात में राजकोट-1 में क्रियान्वित किया गया। इस ज़ोन में, वर्ष 2015-16 व 2018-19 में 73 प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से 1894 ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित किया गया। वर्ष 2019-20 में, आर्या-कृषि विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से कुल 83 प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों का आयोजन कर 2526 युवाओं को प्रशिक्षित किया गया। कुल 87 युवाओं ने अपनी उद्यमिता इकाई स्थापित की। वर्ष 2019-20 में ही, महाराष्ट्र में नासिक-1, उस्मानाबाद, पुणे में वासिम एवं सोलापुर-1, गुजरात में, भावनगर, खेड़ा, नवसारी, आनन्द एवं अमरेली, कुल 10 केन्द्रों की पहचान कर वहाँ पर कार्य प्रारम्भ किया गया। वर्तमान में, 12 कृषि विज्ञान केन्द्रों से आर्या परियोजना का संचालन हो रहा है।

आईसीएआर-अटारी ज़ोन-8 के अन्तर्गत, 13 प्रमुख उद्यमों में नर्सरी प्रबन्धन, फल एवं सब्ज़ी प्रसंस्करण, जैविक खाद उत्पादन, लघु उद्योग, डेयरी, मुर्गी पालन, बकरी पालन, मत्स्य पालन आदि हैं। इच्छुक ग्रामीण युवाओं को गाँवों में नियमित आय प्राप्त करने हेतु अपने सूक्ष्म उद्यमों में नामांकित किया गया व उन्हें एक उद्यमी के तौर पर विकसित किया गया। कृषि विज्ञान केन्द्रों द्वारा युवाओं को कृषि व सम्बद्ध क्षेत्र के उद्यमों में शामिल करने के उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किये गये हैं।

तालिका 1: चिन्हित उद्यम व क्रियान्वयनकर्ता कृषि विज्ञान केन्द्र

उद्यम का नाम क्रियान्वयनकर्ता कृषि विज्ञान केन्द्र का नाम
सब्ज़ियों व फलों का नर्सरी उत्पादनवाशिम, पुणे-द्वितीय, उस्मानाबाद, नागपुर, भावनगर, नवसारी
फल एवं सब्जी प्रसंस्करणवाशिम, पुणे-द्वितीय, उस्मानाबाद, नागपुर, भावनगर, खेड़ा, नवसारी
जैविक खाद उत्पादन सोलापुर-प्रथम, पुणे-द्वितीय, उस्मानाबाद, भावनगर
बकरी पालन सोलापुर-प्रथम, पुणे-द्वितीय, उस्मानाबाद
घरेलू स्तर पर दलहन/अनाज प्रसंस्करण इकाई की स्थापना खेड़ा
मत्स्य बीज पालनवाशिम, आनन्द
चना का बीज उत्पादनसोलापुर-प्रथम
घर के पिछवाड़े मुर्गी पालनवाशिम
ज्वार का मूल्य संवर्धनसोलापुर-प्रथम
छोटी तेल मिल इकाईराजकोट-प्रथम
दूध से खोया बनाने की इकाईराजकोट-प्रथम
मसाला प्रसंस्करण इकाईराजकोट-प्रथम
नमकीन (फरसाण) बनाने की इकाईराजकोट-प्रथम

 

बाक्स 2: केस – 2
दूध से खोया बनाने की इकाई: गुजरात के राजकोट-प्रथम स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा क्रियान्वित आर्या परियोजना से राजकोट जिले के जसदण तालुका के अम्बार्डी गाँव के 8 ग्रामीण युवाओं के समूह लाभान्वित हुए। दुग्ध प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन व बिक्री हेतु उद्यमों को विकसित करने के लिए तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रम व एक्सपोजर विजिट आयोजित किये गये।

उच्च गुणवत्ता वाले दूध-खोया व पेड़ा (मिठाई) जैसे दूध से बने खाद्य उत्पादों के उत्पादन हेतु दूध से खोया बनाने की इकाई की स्थापना की गयी। इसका उद्देश्य कृषि के साथ-साथ पशुपालन से अधिक आय अर्जित करना था। 8 प्रशिक्षित ग्रामीण युवाओं को रू0 63,000.00 की लागत वाली दूध से खोया बनाने की मशीन प्रदान की गयी।

दूध से खोया बनाने की मशीन वर्ष 2017 में अम्बार्डी गाँव में स्थापित की गयी। यहाँ प्रत्येक माह औसतन 1800 लीटर दूध का प्रसंस्करण किया जा रहा है। लगभग 360 किग्रा0 खोया प्रतिमाह उत्पादित होता है। इसमें से 110 किग्र0 खोये का प्रयोग पेड़ा बनाने में किया जाता है। शेष 250 किग्रा0 खोया सीधे उपभोक्ताओं को बेचा जाता है।

समूह ने खोया व पेड़ा बेचकर इस उद्यम से प्रति माह रू0 40,500.00 की शुद्ध आय प्राप्त किया है। यह उद्यम वर्ष भर चलता है और 5 युवाओं को वर्ष में 300 दिन का रोजगार मिला है। समूह के प्रत्येक सदस्य की आय बढ़कर रू0 50,625.00 प्रतिवर्ष हो गयी। समूह के सदस्य आस-पास के गाँवों और जसदण शहर में ‘‘आर्या’’ ब्राण्ड नाम से पेड़ा बेचते हैं। इसके अलावा, पास के गाँव में स्थित ‘‘घेला सोमनाथ’’ मन्दिर में प्रसाद के रूप में भी पेड़ा बेचा जाता है। आस-पास के क्षेत्रों से लगभग 92 किसानों/युवाओं ने इस इकाई का भ्रमण किया और यहाँ से प्रेरणा लेकर यह उद्यम दो और गाँवों में फैल चुका है।

 

कृषि विज्ञान केन्द्र सोलापुर-प्रथम द्वारा क्रियान्वित आर्या परियोजना के अन्तर्गत 11 युवाओं ने ज्वार के मूल्य संवर्धन व प्रसंस्करण का कार्य प्रारम्भ किया है। उनके तैयार मूल्य सवंर्धित उत्पादों को उमेद, कंचन फूड्स, संतोषी माता, जिजाऊ फूड्स द्वारा विकसित ‘‘न्यूट्री’’ ब्राण्ड नाम से स्थनीय एवं महानगरीय बाजारों में बेचा जा रहा है। कृषि विज्ञान केन्द्र पुणे-द्वितीय व कृषि विज्ञान केन्द्र वाशिम द्वारा क्रियान्वित आर्या परियोजना के तहत् ग्रामीण युवाओं द्वारा विभिन्न उद्यम जैसे- सब्ज़ियों व फलों की नर्सरी तैयार करना, फल व सब्जी प्रसंस्करण, जैविक खाद उत्पादन, बकरी पालन व पिछवाडे़ मुर्गी पालन का कार्य प्रारम्भ किया गया। ग्रामीण युवाओं व ग्रामीणों द्वारा अपना व्यवसायिक उद्यम प्रारम्भ करने के तौर पर ये उद्यम बहुत लोकप्रिय हैं। कृषि विज्ञान केन्द्र राजकोट-प्रथम अन्तर्गत ग्रामीण युवाओं द्वारा अपनाया गया मिनी तेल मिल इकाई उद्यम माॅडल के साथ मूल्य संवर्धन व प्रसंस्करण एक अच्छा उदाहरण है, जो विस्तारित हो रहा है। जबकि खोया बनाने की इकाई, मसाला प्रसंस्करण इकाई व नमकीन (फरसाण) बनाने की इकाई जैसे अन्य उद्यमों ने लगातार आय सृजन के लिए अधिक उद्यमशील विकल्प उत्पन्न किये हैं। फल व सब्ज़ियों ने ग्रामीण उद्यमियों का ध्यान आकर्षित किया है जिसके अन्तर्गत रोगमुक्त नीबू वर्गीय पौधों की नर्सरी तैयार करना और कई कृषि विज्ञान केन्द्रों के मार्गदर्शन में आमों का मूल्य संवर्धन है। कृषि विज्ञान केन्द्र आनन्द द्वारा सहायतित मत्स्य पालन एक अन्य उद्यम है।

विभिन्न उद्यमों को सहयोग देने के अतिरिक्त, कृषि विज्ञान केन्द्रों की वार्षिक कार्य योजनाएं प्रस्तुत की गयीं व उनकी गहन समीक्षा भी की गयी। कार्य योजना व समीक्षा के लिए क्षेत्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न कार्यशालाएं आयोजित की गयीं। संक्षेप में, यह देखा जा सकता है कि ग्रामीण युवाओं को शामिल करके सूक्ष्म उद्यम शुरू करने व उनके निरन्तर आय सृजन का जरिया तैयार करने के ये प्रयास अत्यन्त सफल व पे्ररणादायक रहे हैं।

यह लेख मूल रूप से प्रकाशित: कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान – पुणे (2020) आर्या: ग्रामीण क्षेत्रों में स्थाई आय के लिए सूक्ष्म उद्यम से लिया गया है।

 

Source: Youth and Agriculture, LEISA INDIA, Vol. 26, No.2, June 2024

Recent Posts

बायोमाॅस प्रबन्धन का पर्यावरणीय व सामाजिक-आर्थिक सम्बन्ध महिलाओं के नेतृत्व वाली उद्यमशीलता

बायोमाॅस प्रबन्धन का पर्यावरणीय व सामाजिक-आर्थिक सम्बन्ध महिलाओं के नेतृत्व वाली उद्यमशीलता

उत्तराखण्ड के जंगलों में, चीड़ की पत्तियां, जंगल की आग बढ़ाने का एक प्रमुख कारण बनती थीं, और इनका प्रबन्धन एक बड़ी...

जल निकाय आधारित एकीकृत कृषि प्रणाली आदिवासी परिवारांे के लिए एक वरदान है

जल निकाय आधारित एकीकृत कृषि प्रणाली आदिवासी परिवारांे के लिए एक वरदान है

महाराष्ट् में जल निकाय ;स्थानीय नाम बोदीद्ध आधारित एकीकृत कृषि प्रणाली के क्रियान्वयन ने छोटी जोत वाले किसानोें की...